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दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप केसरिया जहां स्वयं भगवान बुद्ध निर्वाण से पहले ठहरे थे।

 

बिहार के चंपारण जिला में केसरिया नामक स्थान पर स्थित बौद्ध स्तूप दुनिया का सबसे बड़ा स्तूप है। सन 1998 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्था ने इस स्तूप को खोज निकाला था। यह माना जाता है कि इस स्तूप का निर्माण भगवान बुद्ध के जीवन के अंतिम समय के स्मरण के लिए लिच्छवीस द्वारा बनाया गया था। मान्यता है कि भगवान बुद्ध जब महापरिनिर्वाण ग्रहण करने कुशीनगर जा रहे थे तो वह एक दिन के लिए केसरिया में ठहरें थे। उसी के स्मरणार्थ केसरिया में यह स्तूप बनाया गया है। यह विशाल काय स्तूप दुनिया के किसी अजूबे से कम नहीं है।

इतिहासकारों का अनुमान है कि इस संरचना के निर्माण का समय 200 ई और 750 ईस्वी के बीच का हॊगा। लगभग 1400 फीट की परिधि पर फैली हुई इस स्तूप की ऊंचाई अब 104 फीट है, जो जावा के बोरोबोडुर स्तूप से भी एक फीट लंबा है। ASI अनुसार इस स्तूप की ऊंचाई 150 फीट थी जो की निरंतर क्षरण के कारण 123 फीस तक घट कर अब 104 फीट हॊ गया है। इस के अतिरिक्त 1934 के विनाशकारी भूकंप ने उत्तर बिहार को हिलाकर रख दिया और भारी प्रमाण की क्षती पहुंचाई थी इसी कारण से इस स्तूप की ऊंचाई और घट गयी।

इस स्तूप में कुल छह मंजिल हैं जो स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। भगवान बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में स्थित मूर्ति और अन्य बैठने की स्थितियों की मूर्ति को मिट्टि और कंकड़ों का उपयोग करके बनाया गया है। छ्त पर प्रदक्षिणा के लिए एक पथ बनाया गया है। स्तूप में उत्खनन के दौरान कई वस्तुएं जैसे सिक्के, तीर के सिर, तांबे और टेराकोटा की वस्तुएं, मिट्टी के दीपक, सजाया गया ईंट और कई चीजे मिलीं है। इस संरचना की खोज एएसआई के लिए एक बड़ी सफलता रही है। स्तूप और आस-पास की जगहों से अभी भी बहुत सी चीजों का पता लगाया जा रहा है, जो उस समय के जीवन और परंपरा पर अधिक प्रकाश डाल सकता है।

56 Buddha Statue, Kesariya.

ASI के निरिक्षक के.के.मोहम्मद के कार्यकाल में इस स्तूप को खोजा गया था। माना जाता है कि इस स्तूप का संबंध चौथी सदी के राजा चक्रवर्ती से है। यहां के स्थानीय निवासी इस स्तूप को देवला यानी ‘भगवान का घर’ कहकर बुलाते हैं। इस संरचना की खुदाई से पहले, यहां के निवासियों का मानना ​​था कि इसके अंदर शिव का मंदिर है, जिसे राजा भीम द्वारा बनाया गया था। अपने निर्वाण से पहले भगवान बुद्ध अपने भिक्षा पात्र को लिच्छवियों जो कि वैशाली के प्रजा थे, उन्हें सौंप दिया था और उन्हें वापस वैशाली लौटने के लिए कहा था। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के स्मरणार्थ इस जगह पर मिट्टी का स्तूप बनाया गया जिसे बाद में मौर्य, संग और कुषाण के काल में आज का विशाल काय स्तूप का आकार दिया गया।

चीनी पर्यटक ने भी इस स्तूप का उल्लेख किया है। ह्यू-एन- त्सांग ने लिखा था कि उसने एक बड़ा  स्तूप किया-शि-पो-लो (केसरी) को देखा था, लेकिन वह सुनसान हो गया था और उस पर वनस्पति उग आयी थी। 2012 में यहां विराट रामायण मंदिर बनाने के लिए अनुमोदन दिया गया था। यह विराट रामायण मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मंदिर होगा। यह मंदिर कांबॊडिया का आंगॊर वाट मंदिर से भी बड़ा होगा। अंगॊर वाट मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर है जो कि 215 फीट ऊंचा है। लेकिन विराट रामायण मंदिर की ऊंचाई अंगॊर वाट की ऊंचाई से दो गुना ज्यादा होगा। यह मंदिर इतना विराट होगा कि मंदिर में एक साथ 20,000 लोगों के बैठने की क्षमता वाला एक हॉल होगा। इस मंदिर का अनुमानित बजट करीब 500 करोड़ रूपए हैं।

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