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शिव लिंग शिव का गुप्तांग नही वास्तव में ब्रह्मांड की आकृति है!!!!जानिए शिवलिंग की वास्तविकता और कैसे इसका निर्माण हुआ?

हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक है भगवान् शिव और शिव की आस्था,शिव के विश्वास के प्रतीक है हम सब के मन में शिवलिंग लेकिन नोंवी और दसवीं शताब्दी में मुघलों के आर्याव्रत और हिन्दुस्तान आने के बाद और सोलवीं और स्तारवीं शताब्दी में अंग्रेजों के भारत आने के बाद शिवलिंग को लेकर  तरह तरह की बातें समाज में फैलने लगे|कुछ मुघलों ने और कुछ फिरंगियों ने भगवान् शिव के लिंग को उनके लिंग अर्थात गुप्तांग की संज्ञा दी और दुर्भाग्य से बहुत हिन्दुओं ने भी इस बात को सच माना|

आज हम आपको ये ज्ञात करवाएंगे की वास्तव में शिवलिंग क्या है|क्यूँ ये इतना पवित्र और पूजनीय है ? इसका गलत अर्थ निकालकर कुछ अन्य मजहबों ने हिन्दू धर्म का मजाक बनाया|पर आज हम सब को इस का सही अर्थ बताकर हिन्दू धर्म  का आदर स्थापित कर सकते है|

एक ही शब्द के विभिन भाषाओँ में अलग अलग अर्थ होते है| संस्कृत भाषा को न जानने वालों ने इसका गलत मतलब निकाल दिया और इसी भ्रम के कारण से ही बहुत सारी स्त्रियाँ शिवलिंग को हाथ नही लगाती जबकि ये गलत है और सच ये है की लिंग का अर्थ होता है प्रतीक, चिन्न या निशान| शिवलिंग शिव का गुप्तांग नही बल्कि उनका प्रतीक है|

कैसे बना शिवलिंग? कैसे ये हमारे ऋषि मुनियों के मन में प्रश्न आया की हम शिव के रूप को लिंग में परिवर्तित करके पूजा और अर्चना करे?

शुन्य,आकाश,अनंत,ब्रह्मांड और निराकार परम पुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया| स्कंध पुराण में कहा गया है की आकाश स्वंय लिंग है|शिवलिंग वातावरण से घुमती धरती तथा सारे अनंत ब्रह्मांड का अक्स है अर्थात धुरी(AXIS) ही लिंग है|वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है|

शिवलिंग का अर्थ अनंत भी होता है अर्थात जिसका कोई अंत न हो,आदि न हो,मध् न हो, जिसकी कोई शुरुवात न हो,जो अंत से रहित हो वो अनंत|ब्रह्मांड में केवल दो ही चीजें है उर्जा और पदार्थ|हमारा शरीर पदार्थ से निर्मित है और आत्मा उर्जा की निर्विती है, उर्जा से बनी है| इस प्रकार से शिव (पदार्थ) और शक्ति (ऊर्जा) का प्रतीक है और इन दोनों के मिलन होने से शिवलिंग बनता है|

अब आपको शंका हो रही होगी की शिव और पार्वती, शक्ति और शिव, प्रकृति और पुरुष इनका मिलन ही शिवलिंग है तो फिर आप फिर से गलत समझ रहे है पर वो सच नही है|सच समझने के लिए पहले हमें योनी का मतलब समझना होगा|संस्कृत में योनी शब्द का अर्थ होता है की जब जीव अपने कर्म के अनुसार जनम पाता है तो उसकी एक योनी बनती है|

पर संस्कृत बहुत स्पष्ट रूप से कहती है की मनुष्य में एक ही योनी है| स्त्री और पुरुष की योनी अलग अलग नही है|जब प्रकृति(स्त्री का प्रतीक) और पुरुष(पुरुष का प्रतीक) ये दोनों जब मिलेंगे तो एक योनी बनेगी|यानी शिवलिंग को बनाते समय शिव और शक्ति मिले नही है बल्कि उन्होंने एक योनी का निर्माण किया है और ये योनी ही हमारे लिए पूजनीय बनी|

शिवलिंग का निर्माण कैसे हुआ ? कैसे हमारे प्राचीन ऋषियों ने जो विज्ञान की गहरी समझ रखते थे उन्होंने शिव लिंग का आकार का निर्माण किया|

स्कंध पुराण के अनुसार आरंभ में ऋषियों ने दीपक की ज्योति पर ध्यान केन्द्रित करके भगवान् को पाने का प्रयास किया पर ध्यान एकाग्र नही हो पाता था क्यूँ की हवा चलती थी और हवा में ज्योति टिम टिम कर हिलने लगती थी और ध्यान बटने लगता था| जब ऋषियों ने लम्बी अवधि तक ध्यान में सफलता नही प्राप्त की तब ऋषियों ने उसका एक विकल्प ढूँढना आरम्भ किया और दीप ज्योति का आकार पत्थर का बनाया और उसे शिवलिंग के रूप में स्थापित और मान्य किया|इसलिए शिवलिंग वास्तव में दीपक ज्योति है|

इस सचाई को सब को बताइए और सब के भ्रम को दूर कीजिये|किसी को हमारी संस्कृति से छेड़ छाड़ न करने दे |हम हिन्दू है हमारी संस्कृति गौरव शाली है|

हर हर महादेव| हर हर महादेव |

 

 

 

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