राजनीति

संस्कृत वर्णमाला की उत्पत्ती महेश्वर सूत्र से हुआ था, भगवान शिव विश्व के पहले स्नायू विशेषज्ञ थे!!

महाकाल की लीला अपरंपार है। शिवजी द्वारा रची गयी महेश्वर सूत्र दुनिया का सबसे प्राचीन ज्ञात संस्कृत वर्णमाला अनुक्रम है। संस्कृत वर्ण माला का मूल महेश्वर सूत्र ही है। पुराणॊं के अनुसार संस्कृत देवताओं की बॊल चाल की भाषा है। संस्कृत की उत्पत्ती भगवान शिव के डमरू से हुई थी। पुराणॊं के प्रकार शिवजी ने ही ब्रह्मांड की रचना की थी। शिवजी ने अपने ब्रह्मांडीय नृत्य को पूरा करने के बाद, डमरू बजाया जिससे ब्रह्मांड की रचना हुई। यही वो ध्वनी है जो श्रृष्टि की रचना, पालन और विनाश में मुख्य भूमिका निभाती है। शब्द तरंगों को ब्रह्मांड का रचनात्मक बल माना जाता है। अब तो नासा ने भी माना है कि ब्रह्मांड में ‘ऒम’ की गूँज सुनाई पड़ती है। ब्रह्मांड में ऐसे शब्द तरंगों का प्रवाह होता है जो एक केन प्रकारेण शिवजी के डमरू के नाद जैसे ही सुनाई देती है!

मान्यता है कि शिवजी ने पहले डमरू का निर्माण किया और तत्पश्चात उस डमरू द्वारा उन्होंने ब्रह्मांड का निर्माण किया था। शिवजी ही नृत्य और संगीत के रचैता है।

नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्त्तुकामो सनकादिसिद्धादिनेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्

पाणिनी को संस्कृत व्याकरण का पितामह माना जाता है। और पाणिनि के अष्ठद्यायी से हमको यह ज्ञात होता है कि संस्कृत वर्णमाला की रचना का मूल शिव सूत्र या महेश्वर सूत्र ही है। शिवजी द्वारा रचे गये चौदह सूत्रों में संस्कृत वर्णमाला के सभी स्वर और व्यंजन हैं। ऋग वेद के अनुसार भगवान शिव जी ही संस्कृत वर्णमाला के अनुक्रम और संस्कृत भाषा को पृथ्वी पर लाये थे। विद्वानों का मानना है कि वर्णमाला की आवाज़ भगवान शिव के ‘डमरू’ से उत्पन्न हुई है, यधपि वह किसी तरह की ध्वनि उपकरण हॊगी। महेश्वर सूत्र एक चिकित्सा मंत्र है अर्थात महेश्वर सूत्र के नित्य पठन से शरीर और मन के सारे रॊग से आपको मुक्ति मिल जायेगी।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

भगवान शिव ने मार्कंडेय को म्रुत्युंजय मंत्र का उपदेश किया था और हम सभी जानते हैं की इस मंत्र के जप से ऋषी मार्कंडेय ने काल को ही हरा दिया था। आज भी जिस व्यक्ति के ऊपर मृत्यु का भय मंडराता है उसे महा म्रुत्युंजय मंत्र का जप करने को कहते हैं। हमारे मंत्र और श्लॊक में कितनी शक्ति है फिर भी हम हमारी ही संस्कृती का उपहास करते हैं ।

भगवान शिव जी को विश्व के पहले स्नायू विशेषज्ञ भी कहा जा सकता है। वो शिवजी ही थे जिन्होंने विश्व में सबसे पहले मस्तिष्क प्रत्यारोपण (head trasnplant) किया था। आपको ज्ञात होगा कि दक्ष प्रजापती की पुत्री देवी सती का विवाह शिव जी से हुआ था। लेकिन दक्ष, शिवजी से घृणा करते थे। दक्ष ने अपने यज्ञ में शिवजी को न्यॊता न देकर शिवजी का अपमान किया था, जिससे कुपित हॊकर देवी सति ने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिये थे। जब शिवजी को देवी सती के मृत्यू के बारे में ज्ञात होता है तो वे क्रॊधित हॊते हैं और यज्ञ स्थल पर प्रकट हॊकर अपने त्रिशूल से दक्ष प्रजापती का सर काट देते हैं।

जब उनका क्रॊध शांत हुआ तो उनके शिवगण ने दक्ष को पुनरुज्जीवित करने का अनुरॊध किया। उस समय यज्ञ में बली चड़ाने हेतू लाये गये बकरे ही वहां प्राप्त थे। शिवजी ने बिना समय नष्ट करते हुए एक बकरे का सर काटकर दक्ष प्रजाप्ती के शरीर पर प्रत्यारॊपण कर दिया और दक्ष को पुनरुज्जीवित किया था। वामन पुराण में इस कथा का उल्लेख है। इसी प्रकार अपने पुत्र गणेश के शरीर में हाथी के मस्तिष्क का प्रत्यारोपण किया था। इन दो घटनाओं से यह प्रतीत होता है कि निश्चित ही शिवजी के पास ऐसी कई विद्या थी जो आज के आधुनिक विज्ञान और तकनीक से भी कई गुना ज्यादा विकसित थी। इसी कारण वश शिवजी के नाम पर कई सारे अन्वेशण और अनुसंधानों का श्रेय है।

हमारे किताबों ने हमें हमारी पुराण के ज्ञान को एक कपॊल कल्पित कहानियों के रूप में दर्शाया है। पश्चिमी देश के अंधे प्रेम में हम इतने मूढ़ हो गये हैं कि हम अपने वेद-पुराणॊं का उपहास करते हैं और उन्हें तुच्छ दृष्टि से देखते हैं। हमारे वेद-विज्ञान सादियों पूर्व ही अधिक विकसित था यह वास्तव है। किसी के मानने या न मानने से वास्तव नहीं बदलता।

महा शिवरात्रि के इस पावन पर्व पर भगवान शिवजी सबको सद्भुद्दी और स्वस्थ शरीर दे यही कामना हैं।
हर हर महादेव… बम बम बॊले… जय महाकाल….

Tags

Related Articles