संस्कृति

एक निहत्ते हिन्दू संत की बहादुरी के सामने बुरी तरह से हार गया भारत का तथाकथित ‘शहनशाह’ अकबर

भारत में जब जब राम का नाम लिया जाता है तब तब हनुमान का नाम भी लिया जाता है। भारत में जब जब महर्षी वाल्मीकी का नाम लिया जाता है तो संत तुलसीदास का भी नाम लिया जाता है। ‘राम चरित मानस’ नामक अमॊघ साहित्य को देश और हिन्दुओं के लिए समर्पित करने वाले तुलसीदास का नाम सूर्य की ही भांती उज्ज्वल और प्रकाश मान है। आधुनिक वैज्ञानिक उच्च तकनीक के सहायता से भी जो न कर पाये उसे तुलसीदास ने अपने ‘हमुमान चालीसा’ द्वारा विश्व को समझाया है। पृथ्वी और सूर्य के बीच के यथावत अंतर को बिना किसी तकनीक की सहयता से सदियों पूर्व ही एक श्लॊक के माद्यम से विश्व को समझाने का श्रेय तुलसीदास कॊ ही जाता है।

सॊलहवीं शताब्दी में जब मुगल अक्रातांऒं का अत्याचार हिन्दुओं के सहनशक्ती की परीक्षा ले रहा था, उस दौर में तुलसीदास जैसे राम भक्त का जीना और रामचरित मानस जैसे कृति को लिखना कितना मुश्किल हुआ हॊगा आप स्वयं ही अंदाज़ा लगा लीजिए। हमारी किताबें अक्सर हमको अकबर को कभी न हारनेवाला अज़ीमो शान शहनशाह के रूप में दिखाता है। लेकिन सच तो यह है कि अकबर हिन्दु राजा-रानियों से बार बार पिटता रहा है। शस्त्रधारी क्षत्रिय-क्षत्राणियों को छोड़िये अकबर तो एक निहत्ते साधू-संत तुलसीदास से भी हारा था। इसके बारे में कभी कॊई आपको नहीं बतायेगा।

तुलसीदास अकबर के ही समकालीन थे। इस्लामी आतंकियों से आहत हिन्दु धर्म के पुरुत्थान, प्रचार और प्रसार कार्य में मग्न तुलसीदास पर साक्षात प्रभु श्री राम की कृपा थी। कलियुग में भी भगवान के दरशन के  सौभाग्य प्राप्त करनेवाले कुछ ही लोगों में से एक हैं तुलसीदास। तुलसीदास के चरचे चारॊं दिशा में फैलने लगे थे। इसी तरह उड़ते उड़ते तुलसीदास जी के राम भक्ती के किस्से अकबर के कानों में भी पड़ गये। सत्ता के अहंकार में चूर मतांद अकबर के सीने में सांप लॊटने लगा और उसने तुलसीदास जी को संदेशा भिजवाया कि वे राम ध्यान, भजन, कीर्तन सब बंद करदे और अकबर की मनसबदारी स्वीकार करे।

लेकिन तुलसीदास ने उत्तर भिजवाया कि

हम चाकर रघुबीर के, पट्टो लिखो दरबार ,
अब तुलसी का होइ है, नर के मंसबदार

राम के अलवा किसी और की मनसबदारी तुलसीदास को स्वीकार नहीं था। कुपित अकबर ने तुलसीदास को जबरन अपने महल में बुलवाया और अपने चमत्कार से एक मृत व्यक्ति को जीवित करने की अज्ञा दी। तुलसीदास ठकरे राम भक्त चमत्कार करके लोगों को रुझाना उनका उद्देश्य नहीं था। उन्होंने अकबर की आज्ञा की अवहेलना की जिससे अकबर आक्रांत हो उठा। अकबर ने यह कहते हुए “हम इस राम को देखेंगे”, फतेहपुर सीकरी में तुलसीदास को कैद कर दिया। तुलसीदास ने अकबर के सामने घुटने टेकने से इन्कार कर दिया और वहीं पर उन्होंने हनुमान की प्रशंसा में एक कविता बनाई और इसे चालीस दिन तक लगातार बिना रुके पठन करते रहे। इसी को आज हम हनुमान चालीसा कहते हैं।

मानो चमत्कार ही हो गया। भक्त संकट में हो और भगवान न आये ऐसा हो सकता है भला? पता नहीं कहां कहां से कपि सेन्य फतेपुर सिकरी में आने लगा और पूरे के पूरे सिकरी को तहस नहस करने लगा। सिकरी के हर घर में कपियों ने प्रवेश किया, यहां तक कि अकबर के अन्त: पुर के अंदर भी जाकर लोगों को खरोंचने लगा और उनके ऊपर ईंटों को फेंकने लगा। अकबर के होश उड़ गये और उसे पता नहीं चला कि इस कपि सैन्य के आक्रमण को वह कैसे रॊके। तब एक बुज़ुर्ग हाफिज़ ने उसे बताया कि यह राम जी का ही प्रकॊप है कि उसने एक राम भक्त साधू को अकारण ही बंधी बना लिया है।

अकबर को तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ और वह दौड़ता हुआ तुलसीदास के चरणॊं में जा गिरा। अकबर के अहंकार को एक निहत्ते संत ने बिना शस्त्र उठाये चूर चूर कर दिया। तुलसीदास ने अकबर को क्षमा किया और चमत्कार हो गया, सारे वानर वापस लौट गये। तुलसीदास ने अकबर को सिकरी छोड़ने की आज्ञा दी और वह तुरंत दिल्ली लौट गया। राम का कहर अकबर के मन में इतना था की उसने फरमान जारी किया कि भविष्य में कॊई भी राम और हनुमान के भक्तॊं को तंग नहीं करेगा!! यही है राम भक्तों की ताकत। यही है हिन्दू धर्म की शक्ति। संत से हार गया अकबर फिर भी वह महान और अकबर को हराने वाले संत का नाम किसी भी पुस्तक में नहीं। ये है मेरा भारत महान….

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