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अंटार्टिका के झील में मिले स्वस्तिक का रहस्य कया है? क्या रूस में पाया गया 120 मिलियन वर्ष पूर्व का नक्षा दक्ष प्रजापती द्वारा बनाया गया है?

रूस या रशिया सनातन काल में भारत का ही भूभाग हुआ करता था। पुराणॊं में रूस का नाम “स्त्री वर्शा” हुआ करता था यानी महिलाओं का साम्राज्य हुआ करता था। दक्ष प्रजापती, ब्रह्मा जी के पुत्र थे और उनकी पुत्री देवी सती का विवाह शिवजी से हुआ था। पुराणॊं के अनुसार मानव जाति के निर्माता दक्ष प्रजापती थे। इतिहास कहता है कि मानव जाति का उगम 200,000 वर्ष पूर्व हुआ था। ऐसे में रूस में एक 3-D नक़्शे की खोज की गयी है जिसे ‘निर्माता के मानचित्र’ कहा जाता है। यह नक्षा एक पत्थर पर बनाया गया है और यह नक्षा 3-D के रूप में है।

रूस के उरल पर्वतावली में इस नक्षे को खोजा गया था। इसे दक्ष प्रजापती का नक्षा भी कहा जाता है। आश्चर्य की बात है कि यह नक्षा तीन-आयामी तकनीक से बना है। यह पत्थर रूसी संघ के बश्कोरतोस्तान के चंद्रा गांव में पाया गया था। शोधकर्ताओं का मानना है कि दक्ष प्रजापती का नक्षा उच्च तकनीकी और सांस्कृतिक स्तरों के साथ एक प्राचीन सभ्यता के अस्तित्व का सबूत है। अगर यह सच है तो वैश्विक बाढ़ के पहले और बाद लोगों की सभ्यता और संस्कृती को उजागर करने में यह नक्षा मदद कर सकता है। बश्कोरतोस्तान के किंवदंतियों के अनुसार गहनों के अनेक थालियां उस जगह पर पाई गयी थी। 1921 में, चन्द्र गांव का दौरा करने वाले इतिहासकार वक्रुशेव ने ऐसे छह थालियों के होने की संभावना जताई थी जिनमें से चार गुम हो गये हैं और केवल दो ही पाये गये हैं। जबकि वास्तव में ऐसे दो सौ थालियां होनी चाहिए थी।

दक्ष का पत्थर 1.5 मीटर लंबा और 20 सेंटी मीटर मॊटा और एक मीटर चौड़ा है और उसके ऊपर उरल पर्वतावली की नदियों का नक्षा खुदा हुआ है। इस पत्थर में तीन परत है जिसे कृत्रिम साधन के सहायता से बनाया गया है। डोलोमाइट के आधार से पता चलता है कि 18 सेंटीमीटर की पहली परत सीमेंट या सिरेमिक से बनाई गयी है। एक इंच मोटी दूसरी परत सिलिकॉन से समृद्ध है जिसका उद्देश्य चित्र को शक्ति देना है। तीसरी परत चीनी मिट्टी से बनाई गयी है जो कुछ मिलिमीटर ही है जिसे पत्थर को प्रकाश देकर रॊशन बनाने के लक्ष्य से बनाया गया है। आधुनिक अवधारणाओं के अनुसार, ऐसे छवि आप ब्रह्मांडीय ऊंचाइयों से प्राप्त कर सकते हैं जो दक्ष के नक्षे में पायी  गयी है। तात्पर्य है कि जिस तरह आज हम उपग्रहों के सहायता से नक्षा बनाते हैं, उसी तरह दक्ष का नक्षा बनाया गया है।

दक्ष के नक्षे के अनुसार यह दावा किया जाता है कि पानी के बहाव की प्रणाली, पंद्रह हज़ार किलो मीटर की चैनल लंबाई, एक मील तक चौड़ी 12 बांध और पानी का प्रवेश आदि दिखाया गया है। नक्षे में तिर्यग्वर्ग और रनवे हैं जो पानी के चैनलों से बहुत दूर है। संशोधन्कर्ताओं के अनुसार उसे बनानेवाले जो लोग थे या तो वो ‘उड़’ गये थे या फिर वे ‘जल मार्ग’ से प्रस्थान किये थे, क्यों कि नक्षे में सड़क का नमों निशान नहीं है! नक्षे में कई शिलालेख भी हैं जिसे अज्ञात मूल की वर्ण-व्याख्या भाषा माना जा रहा है जिसे आज तक कॊई भेद नहीं पाया। दक्ष प्रजापती पृथ्वी पर पहले मनुष्य थे जो ब्रह्मा जी के पुत्र थे और भारत के उत्तर पश्चिम दिशा में रहते थे। माना जाता है कि शिवजी के प्रकोप से बचने के लिए दक्ष अंटार्टिका में जाकर छुप गये थे। अब वैज्ञानिकों ने अंटार्टिका के सदियों पुरानी सरॊवर में स्वस्तिक के चिन्ह को खोज निकाला है।

इसमें कॊई आश्चर्य की बात नहीं है। आज दुनिया के जिस जगह पर भी खोज और उत्खनन हो रहा है वहां हिन्दू देवी-देवताओं से जुड़े कलाकृतियाँ और मूर्तियां मिल रही है। अंटार्टिका के सबसे बड़े जलमग्न झील वस्तोक में बीस मिलियन वर्ष पुराना एक स्वस्तिक चिन्ह मिला है जो 100 मीटर लंबा और चौड़ा है। यह स्वस्तिक सोने से बनाया गया है और अब तक पाए गये चिन्हों में से दुनिया का सबसे पुराना चिन्ह है। सनातन धर्म में स्वस्तिक की मान्यता बहुत अधिक है। दुनिया के कॊने कॊने से सनातन धर्म से जुड़ी वस्तुएं प्राप्त हो रही है जिससे यह साबित होता है कि सनातन धर्म ही सभी धर्मों की जननी है। हमारे वेद-पुराण झूठ नहीं बोल रहे हैं और वहां लिखी हर एक बात सच है। किसी के मानने या ना मानने से सच नहीं बदल सकता।

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