अभिमत

80 साल के पाकिस्तानी बुजुर्ग ‘भारतीय’ बनकर मरना चाहते हैं। जानिये क्यूँ?

सन् 1946 में एक बालक पाकिस्तान में जा उतरता है। जो बालक भारत से नंद किशोर बनकर पाकिस्तान गया था वह करीब 19 साल के बाद हस्मत अली बनकर भारत वापस लौटता है। आज हस्मत अली 80 साल के हो गये हैं और उनकी अंतिम इच्छा है कि उनकी मृत्यु भारत में, ‘भारतीय’ नागरिक बनकर ही हो। वे कई वर्षों से भारत के उत्तराखंड में रह रहे हैं और आज उनकी वीसा की अवधी समाप्त होने के कारण उनको वापस देशांतरण कर पाकिस्तान जाना पड़ रहा पर वे किसी भी हाल में वापस नहीं जाना चाहते हैं।

80 साल के बुजुर्ग हस्मत अली वास्तव में भारतीय थे। पाकिस्तान जाने से पूर्व वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया गांव में रहा करते थे। लेकिन 1946 में उनकी माता ने उन्हें कराची में अबू अहमद नामक ज़मीन्दार के पास काम करने के लिए भेज दिया। बालक नंद किशोर पाकिस्तान जा पहुंचता है। उस वक्त वे केवल 8 साल के थे। ठीक एक साल पश्चात भारत में अंग्रेज़ों की हुकूमत का अंत हुआ और भारत को दो हिस्सों में बांटा गया। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त नंद किशॊर पाकिस्तान में ही रह गये। उनकी माता अपने बेटे के लिए चिंतित थी और रेल्वे में काम करनेवाले व्यक्ति के हाथ पांव पकड़कर अपने बेटे को भारत वापस लाने की गुहार लगाती रही।

करीब 19 साल बाद नंद किशॊर भारत वापस आये लेकिन एक नये नाम और नयी पहचान के साथ। 8 साल का बालक 27 का युवा हो चुका था। अब वे नंद किशॊर से हस्मत अली बन चुके थे और उनके पास पाकिस्तानी पासपॊर्ट था। पाकिस्तानी नागरिक होने के कारण उन्हें अपने ही देश में भगोड़े के जैसे जीना पड़ा। उत्तराखंड के बाहारी छॊर में एक छोटे से गांव रुद्रपुर में बस जाते हैं और वहीं गांव की लड़की से विवाह कर लेते हैं। इतने वर्ष भारत में बिता कर ये बुजुर्ग आज अपने देशांतरण को लेकर बहुत चिंतित हैं। उनकी शारीरिक हालत भी ठीक नहीं हैं। ना तो वे बिना सहारे के चल पाते हैं और ना ही ठीक से बॊल पाते हैं। ऐसी हालत में वे उस देश में जाकर मरना नहीं चाहते जो देश कभी उनका था ही नहीं।

विषम परिस्थितियों के कारण नंद किशॊर को पाकिस्तान में रहना पड़ा था। भारत-पाक विभाजन उनके जीवन में कठिनाई लेकर आया  था। वर्षों के तपस्या के बाद उन्हें अपने देश भारत लौटने का अवसर प्राप्त हुआ लेकिन आज उनके बुढ़ापे के समय उन्हें वापस पाकिस्तान लौटना पड़ रहा है यह खेद की बात है। वास्तव में साल 2000 में ही उनको पाकिस्तान वापस लौटना था। लेकिन मानवीय मूल्यों के आधार पर उनकी देशांतरण की प्रक्रिया को स्थगित किया गया। उसके बाद 2008 में एक बार फिर उनके केस को सरकार के सामने लाया गया लेकिन सरकार ने उनकी नाज़ुक हालत को देखकर भारत में ही रहने दिया।

हस्मत अली( नंद किशॊर) के चार बेटे हैं और उनका कहना है कि वे अपने पिताजी के लिए चिंतित हैं। उनके बेटे कहते हैं कि पिताजी को पाकिस्तानी बन कर ही मरना पड़ेगा क्योंकि पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार वे 1965 में पाकिस्तान से भारत आये थे और वे पाकिस्तानि नागरिक है। नंद किशॊर की इच्छा है कि उनकी मृत्यु भारत में एक भारतीय नागरिक के रूप में ही हो। शारीक रूप से कमज़ॊर नंद किशॊर अब इस हालत में पाकिस्तान नहीं जा पायेंगे। उनकी बहू हर पल उनका खयाल रखती है। नंद किशॊर आशावादी भावना रखते हुए बड़बड़ाते हैं “मेरे मातृ भूमी में मेरे साथ कुछ बुरा नहीं होगा”। हम सरकार से प्रार्थना करते हैं कि इस बुजुर्ग की भारत में एक भारतीय नागरिक बनकर मरने की उनकी अंतिम इच्छा को पूर्ण किया जाये। जो देश उनका था ही नहीं वहां उनको इस बुढ़ापे में क्यों भेजना आखिर नंद किशॊर भारत माँ के ही बेटे हैं उन्हें यहीं रहने दिया जाये।

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