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19 जनवरी 1990 के उस दिन के बारे में जानके आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे जब लाखो कश्मीरी पंडितों को पाकिस्तान परस्त मुस्लिम आतंकियों ने कश्मीर से खदेड़ दिया था

कश्मीरी पंडित ये दिन कभी नही भूल पायेंगे, तब से ले के आज तक वे अपने ही देश मे शरणार्थी बन के रह रहे हैं ।

 

 

“घर के अन्दर भी खतरा था

घर के बहार भी जोखिम था

उन्होंने खाया तरस हमारी हालत पर

और एक एक कर फूंक डाले हमारे घर

अब न अंदर खतरा है न बहार जोखिम”

ये अपनी मिट्टी,अपने ज़मीन,अपनी दुनिया से अलग हुए लोगों का दर्द है|ऐसे करीब ३.5 लाख कश्मीरी पंडित है जो अपनी मिटटी से अलग होकर देश और दुनिया के अलग अलग हिस्सों में ज़िन्दगी बिता रहे है|

कश्मीर शिकारों की दुनिया,चिन्नारों की दुनिया, कुदरत के हसीन नज़ारों की दुनिया,ये झरने,ये नदियाँ,ये पहाड़,ये सबज़वादियाँ,ये दुनिया अगर छीन जाये तो किस का दिल न तड़प उठे|जहां बचपन बीता वो गलियाँ छूट गयी,जहाँ जवान हुए वो मिट्टी छीन ली गयी|जब भी ज़िक्र ऐ कश्मीर होता है तो कश्मीरी पंडितों की पीड़ियाँ ऐसे ही गम के समुंदर में डूब जाते है|

कश्मीर में सदियों से रहनेवाले हिन्दू कश्मीरी पंडित कहलाते है| कश्मीरी पंडित घाटी के मूल निवासी है|इनकी सभ्यता 5000 साल पुरानी है|कश्मीरी पंडित घाटी के हिन्दू अल्पसंखक है|इनकी कुल आबादी करीब 4 लाख थी|इनकी ज़िन्दगी अमन,चैन के साथ गुज़र रही थी लेकिन साल 1989 से ये महौल बिगड़ने लगा|सितम्बर 14, 1989 बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य और जाने माने वकील कश्मीरी पंडित तिलक लाल तप्लू का JKLF ने क़त्ल कर दिया ! उसके बाद जस्टिस नील कान्त गंजू को गोली मार दी गई !

एक के बाद एक अनेक कश्मीरी हिन्दू नेताओ की हत्या कर दी गयी ! उसके बाद 300 से ज्यादा हिन्दू महिलाओ और पुरुषो की नृशंस हत्या की गयी ! श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करने वाली एक कश्मीरी पंडित नर्स के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उसके बाद उसकी हत्या कर दी गयी ! यह खूनी खेल लगातार चलता रहा और हैरत की बात यह है कि तत्कालीन राज्य एवं केंद्र सरकारों ने इस गंभीर विषय पर कुछ नहीं किया !

फिर जनवरी 4, 1990 आफताब, एक स्थानीय उर्दू अखबार ने हिज्ब -उल -मुजाहिदीन की तरफ से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की – “सभी हिन्दू अपना सामान पैक करें और कश्मीर छोड़ कर चले जाएँ !” एक अन्य स्थानीय समाचार पत्र, अल सफा ने भी इस निष्कासन आदेश को दोहराया ! मस्जिदों में भारत और हिन्दू विरोधी भाषण दिए जाने लगे ! सभी कश्मीरी हिन्दू/मुस्लिमो को कहा गया कि इस्लामिक ड्रेस कोड अपनाये ! सिनेमा और विडियो पार्लर वगैरह बंद कर दिए गए ! लोगो को मजबूर किया गया कि वो अपनी घड़ी पाकिस्तान के समय के अनुसार कर लें !

जनवरी 19, 1990 सारे कश्मीरी पंडितो के घर के दरवाजो पर नोट लगा दिया गया, जिसमे लिखा था “या तो मुस्लिम बन जाओ या कश्मीर छोड़ कर भाग जाओ या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ” ! ये वो दौर था जब फारूक अब्दुल्लाह की सरकार अलगाववादियों के सामने बेवस नज़र आ रही थी| केंद्र में वीपी सिंह की सरकार थी |उन्होंने हालत को काबू पाने के लिए जगमोहन को राज्यपाल बनाके  भेज दिया ,जगमोहन ने दूसरी बार राज्यपाल पद सम्भाला था और इससे नाराज़ होकर फारूक अब्दुलाह ने इस्तीफा दे दिया|

कानून व्यवस्था पर काबू करने के लिए जगमोहन ने पहले ही दिन राज्य में कर्फु लगा दिया लेकिन अलगाववादी हिंसक आन्दोलन का मन बना चुके थे| 19 जनवरी की शाम होते होते कश्मीरी पंडितों के लिए महौल खोफ्नाक होता चला गया, पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने टीवी पर कश्मीरी मुस्लिमो को भारत से आजादी के लिए भड़काना शुरू कर दिया ! उस रात  हज़ारों कश्मीरी मुसलमान सड़कों पर आगये| उन्होंने कश्मीरी पंडितो के घरो को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया !आज़ाद कश्मीर के नाम पर चारों तरफ जलूस निकल रहे थे, हर गली हर तरफ से पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे थे,सब जलाया जा रहा था,मस्जिदों में से आज़ान की जगह ऐलान हो रहा था, कश्मीर छोड़कर चले जायो वरना मारे जायोगे,जिसको यहाँ रहना है निज़ामे मुस्तफा पढ़ के रहना है|

कुछ महिलाओ को जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया ! बच्चो को स्टील के तार से गला घोटकर मार दिया गया ! कश्मीरी महिलाये ऊंचे मकानों की छतो से कूद कूद कर जान देने लगी ! और देखते ही देखते कश्मीर घाटी हिन्दू विहीन हो गई और कश्मीरी पंडित अपने ही देश में विस्थापित होकर दरदर की ठोकर खाने को मजबूर हो गए

28 साल होगये ये कश्मीरी पंडित अपने घर नही लौट सके है|इनकी खोयी हुई जन्नत इन्हें आज तक वापिस नही मिली है|19 जनवरी 1990 की तारीख कश्मीरी पंडितों पर कयामत बन के टूटी थी|रातों रात कश्मीरी पंडितों ने अपना सब कुछ गवा दिया था|आज 28 साल बीत चुके है लेकिन मिटटी पर वापिस लौटने की आस हर  विस्थापित कश्मीरी के दिल में आज भी जिंदा है|हर कश्मीरी पंडित के दिल की आवाज एक ही बात कहती है की कश्मीर में बीते दिनों की याद दिल से नही जाती|काश वे दिन वापिस आजाये|दहशतगर्दों  का जो मंज़र उन्होंने देखा उसे भुला पाना मुश्किल नही | आज भी इन बेवतनों को वतन की याद आती है,अपने घर की मिटटी की खुशबु अपनी तरफ खींचती है|आज भी इनकी एक ही आवाज़ है “मेरा कश्मीर मुझे लौटा दो ”

मोदी जी ने कश्मीरी पंडितों को दुबारा बसाने का वादा किया था|इससे इन सब के मन में एक उम्मीद जगी है|हम यही दुआ करते है की इनकी ये दुआ कबूल हो जाये|

 

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