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सेक्यूलर और बुद्दिजीवी ये जान कर जल उठेंगे -“UNESCO ने भारत के कुम्भ मेला को ‘मानवता का अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ के प्रतिनिधी सूची में जगह दिया”

दुनिया का सबसे पुरातन धर्म है सनातन धर्म और सनातन धर्म की एक धरॊहर और परंपरा है कुम्भ मेला। दुनिया के किसे अजूबे से कम नहीं है भारत का यह कुम्भ मेला जो बारह साल में एक बार अयॊजित होता है। दुनिया भर से करोड़ों की संख्या में शृद्दालू इस कुम्भ मेला में भाग लेने आते हैं। करोड़ों लोगों की भीड़ इतना अनुशासन और शांती पूर्ण तरीके से कुम्भ मेला में हिस्सा लेती है कि UNESCO भी दंग रह गया और उसने कुम्भ मेला को अपने प्रतिनिधी सूची में ‘मानवता का अमूर्त सांस्कृतिक विरासत-2017’ कहते हुए उत्कीर्ण कर दिया है। आप तो जानते हैं की UNESCO विश्व भर की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े स्मारकों की पहचान करता है और उसे विश्व सांस्कृतिक सूची में सूचित करता है।

यह सभी स्मारक मूर्त रूप में होते हैं जिसे हाथों से छूकर उसका अनुभव लिया जा सकता है। लेकिन कुम्भ मेला एक ऐसी विरासत है जो अमूर्त है, जिसे हाथॊं से छुआ नहीं जा सकता बल्कि केवल आँखो से निहारा जा सकता है और हृदय से आनंद का अनुभव लिया जा सकता है। कुम्भ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना है। माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसकी शुरुआत की थी, लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुम्भ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी। पुराण के अनुसार देव और असुर द्वारा की गयी समुद्र मंथन में निकले अमृत का कलश हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक इन चार स्थानों पर जाकर गिरा था इसीलिए इन चार स्थानों पर कुम्भ का मेला लगता है।

जिस जगह पर निर्धारित समय में कुम्भ का मेला लगता है उस जगह करोड़ों की संख्या में भक्त जन पवित्र स्नान कर अपना पाप धॊने हेतू बिना किसी निमंत्रण के आ जाते हैं। साधू, संत, महंत, विद्वान, पंडित, पामर, धनिक, निर्धनिक, पुरुष, महिला, बालक हर प्रकार के लोग कुम्भ मेला में हिस्सा लेते हैं। यहां लोगों की न उम्र देखी जाती है न जात पात, न उनकी आर्थिक स्थिती देखी जाती है न उनका पद। यहां सब एक बराबर है न कॊई ऊँचा न कॊई नीचा। वसुदैव कुटुंबकम का जीता जागता निदर्शन है कुम्भ का मेला।

UNESCO के अनुसार विज्ञान, खगॊल, ज्यॊतिष्य, अध्यात्म, कर्म परंपरा, सांस्कृतिक और सामाजिक प्रथाओं का एक अद्भुत संगम है कुम्भ का मेला। एक स्थान पर करोड़ों लोगों के जमा होने के बावजूद भी कुम्भ के मेले का अयॊजन जिस प्रकार शांती पूर्ण ढ़ंग से और अनुशासन से होता है ऐसा दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी धर्म में नहीं होता। सांस्कृतिक विविधताओं में भी एकता दर्शाता है कुम्भ का मेला। सदियों के ज्ञान के भंडार को एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को, गुरु शिष्य परंपरा, साधू-संत और अखाड़ों द्वारा प्रावाहित करने वाला यह मेला दुनिया के किसी अजूबे से कम नहीं है।

भारतीय खगॊल विज्ञान के अनुसार गुरू एक राशि में लगभग एक वर्ष रहता है और बारह राशि में भ्रमण करते हुए उसे 12 वर्ष का समय लगता है। इसलिए हर बारह साल बाद उसी स्थान पर कुंभ का आयोजन होता है जहां बारह वर्ष पूर्व मेला लगा था। लेकिन कुंभ के लिए निर्धारित चार स्थानों में अलग-अलग स्थान पर हर तीसरे वर्ष कुंभ का अयोजन होता है। कुंभ के लिए निर्धारित चारों स्थानों में प्रयाग के कुंभ का विशेष महत्व है क्यॊंकि यहां144 वर्ष बाद महाकुंभ का आयोजन होता है। हरिद्वार में 2022 में, प्रयाग में 2025, और उज्जैन में 2028 वर्ष में कुम्भ मेला का अयॊजन होने वाला है। 2019 में प्रयाग में अर्ध कुम्भ मेला का अयॊजन होने वाला है।

हमारे देश के सेक्यूलर और बुद्दीजीवी मंडली को हमेशा से ही हिन्दु सभ्यता और मान्यताओं से परहेज़ है। उनके सीने में जलन उत्पन्न करने के लिए इतना काफी है कि UNESCO ने अपने मानवता के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत-2017 के प्रतिनिधि सूची में भारत के गौरव कुम्भ मेला को जगह दिया है। सनातन धर्म में नुक्स निकालनेवाले मंद बुद्दी दॊगले हिन्दुओं और कुम्भ के मेले के आयॊजन के खर्च पर प्रश्न उठाने वाले कट्टरपंथी मुल्लों को यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगेगी। पर हमें इससे क्या हम तो जोर जोर से चीखेंगे हर हर महादेव… जय माँ काली….

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UNESCO
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