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विमुद्रीकरण के विरोध के बावजूद भी कैसे उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने अपना पंचम लहराया

 

एक साल पहले 8 नवंबर को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 रुपये और 1,000 रुपये की मुद्रा को बंद करने की घोषणा करते हुए सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। ये लगभग उसके दो महीने पहले हुआ जब चुनाव आयोग ने  पांच राज्य उत्तर प्रदेश (यूपी), उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा  में विधानसभा चुनावों की घोषणा की थी।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यूपी सबसे महत्वपूर्ण था क्योंकि 403 विधानसभा सीटों पर दांव पर लगा हुआ था। चूंकि 2014 की लोकसभा चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 80 सीटों में से 73 में जीत हासिल की थी, इसलिए वे अपने प्रदर्शन को दोहराने के लिए दबाव में थे। इसके अलावा, प्रधान मंत्री वाराणसी से चुने गए और इस प्रकार,उस राज्य का प्रतिनिधित्व किया। इसलिए, हर कोई एक सवाल पूछ रहा था: क्या विमुद्रीकरण से यूपी चुनाव में बीजेपी के परिणाम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा?

यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि राज्य में सभी बैंकों और एटीएम पर लंबी कतारें थीं। कई मीडिया घरों ने ये भी दिखाया की इसके कारण  कतारों  में खड़े लोग बीमार हो रहे है और मर भी रहे है बिना इस बात की पुष्टि किए बिना की उनकी बीमारी या मौत की सही वजह क्या है।   विमुद्रीकरण के ठीक 3 दिन बाद 11 नवंबर 2016  को – देवोथान एकादशी को यूपी में मनाया गया। यह त्योहार, हिंदू विश्वास के अनुसार, भगवान विष्णु के चार महीने नींद  के बाद  की जागृति का संकेत  है (जिसके दौरान विवाह वर्जित कर रहे हैं)। देवोथान एकदशी शादी के मौसम की शुरुआत का संकेत करता है, दोनों ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि साप्ताहिक बैंकों से निकासी पर सरकार की ओर से अधिकतम सीमा लगा दी गयी जिसकी वजह से वै स्वयं के पैसे निकालने के लिए सक्षम नहीं थे।

लोगों द्वारा झेली जा रही कठनाइयों की वजह से बहुत से बीजेपी नेता भी सकते में आगये थे की चुनाव का क्या परिणाम होगा। कुछ लोगों ने चुनाव को स्थगित करने का विचार भी किया जब तक कि स्थिति सामान्य न हो जाये। हालांकि, कई अन्य राज्य, जहां स्थानीय निकाय चुनाव हुए जैसे की महाराष्ट्र, उड़ीसा, चंडीगढ़ ,गुजरात वहाँ भाजपा को जीत प्राप्त हुई,ये  कुछ सकारात्मक संकेत थे।

जब विमुद्रीकरण चारों और फैला हुआ था,तभी अचानक समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच सत्ता  के संघर्ष की वजह से सुर्खियों में आगयी और यही कारण है कि लोगों का कुछ समय के लिये ध्यान विमुद्रीकरण से कम हो गया ।

इसके साथ ही, सरकार नकदी संकट की स्थिति को कम करने और डिजिटल अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ने के लिए लगातार कदम उठा रही थी। दिसंबर के अंत तक और नए साल की शुरुआत, सामान्य तौर पर, सभी बैंक और एटीएम सामान्य रूप से कार्य करने लगे । और 1 फरवरी 2017 से,व्यापारियों और राजनेताओं के संकट को कम करते हुए चालू खातों से नकद निकासी पर सभी सीमाओं को समाप्त कर दिया गया।

विपक्षी दलों ने उम्मीद लगाई दी थी कि लंबी कतारें और नकद निकासी में कठिनाइयों की वजह से भाजपा को चुनाव में नुकसान होगा। लेकिन, एक बात वै भूल गये की उन कतारों में कौन  लोग थे? उनमें से कई लोग अपने खुद के पैसे वापस लेने के लिए वहां नहीं थे; वे खाताधारक नहीं थे और नोट बदलने के लिए किसी भी बैंक के बहार खड़े हो सकते थे। वास्तविक खाताधारक किसी भी राशि को जमा कर सकते हैं और साप्ताहिक अधिकतम सीमा के साथ सामान्य रूप से 25,000 रुपये की राशि  बैंकों से ले सकते हैं। इसका मतलब  है की एक महीने में आप एक लाख निकाल सकते थे पर ज्यादातर भारतीयों को मासिक आधार पर इस तरह की भारी नकदी की जरूरत नहीं होती।

बैंक की कतार में ज्यादा वो लोग थे जो ‘सामाजिक सेवा’ कर रहे थे उन्हें पता था कि वै गलत कर रहे है, लेकिन  वै खुश थे क्योंकि उन्हें इससे जल्दी कमाई करने का मौका मिल रहा था। इसी वजह से, मोदी को विमुद्रीकरण करने के लिए शाप देने के बजाय, वे वस्तुतः उनके प्रशंसक बन गये।

आम आदमी ने विमुद्रीकरण को  एक आर्थिक उपाय के रूप में नही देखा बल्कि इस वजह से आश्वस्त महसूस किया कि यह अनैतिक अमीर, उच्च कर अपवंचकों और असामाजिक तत्वों पर मोदी का हमला था – वे आतंकवादियों,दवा विक्रेताओं हो या जम्मू और कश्मीर के पत्थरबाजी करने वाले हो। उसके बाद परिणाम सब के सामने था । विधानसभा चुनाव के परिणाम ने भाजपा को भी आश्चर्यचकित कर दिया, जिसने कभी 403 सीटों में से 325 ऐसे विशाल बहुमत नहीं सोचा होगा  उन्होंने केवल 265 सीटों का अनुमान लगाया था  लेकिन मतदाताओं ने उन्हें तीन-चौथाई बहुमत से अधिक दे दिया।

क्या उत्तर प्रदेश के लोग अभी भी उस  स्थिति  में है ,जहां वे एक साल पहले थे ? स्थिति बहुत ज्यादा नहीं बदली है, विमुद्रीकरण के बाद वस्तु और सेवा कर के लागु होने से व्यापार और लघु व्यवसाय समुदाय के लिए कठिनाइयां लाई हैं। कई मामलों में, विक्रेता और सेवा प्रदाता जीएसटी चार्ज कर रहे हैं लेकिन एक यह नहीं पता कि क्या वे सरकार को दे रहे हैं या नहीं।

हालांकि, मोदी पर लोगों का विश्वास पक्का है हालांकि कुछ ऐसे लोग है जो मोदी के खिलाफ आवाज उठा रहे है। भारत के साधारण लोग कई क्षेत्रों में असाधारण समग्र नीति पहल देख सकते हैं जो वैश्विक स्तर पर भारत को वैश्विक मान्यता प्रदान कर रही है और कई क्षेत्रों में  उसकी रैंकिंग में सुधार कर रही है। लोग  विमुद्रीकरण को आर्थिक और राजनीतिक सुधारों की दिशा के लिए एक कदम के रूप में  देखने के लिए तैयार हैं और मोदी जी  के साथ चलने  के लिए धैर्य रखते है ।


निहारिका

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