सैन्य सुरक्षा

म्यूनिख ओलंपिक हमले के समय इज़रायल की कार्रवाई दुनिया के लिए मिसाल है:आतंक से निपटने का ये इज़रायली तरीका सब देशों को सीखना ही चाहिए

 

सन 1972 के उस दिन अगर इजरायल ने 234 अरब छापामारों को रिहा कर दिया होता तो आज इजराइल के 11 ओलंपिक खिलाड़ी जिंदा होते| मगर ऐसा नही हुआ क्यूँकि देशहित में सोचते हुए इजरायल ने उन आातंकवादियों के सामने घुटने टेकना मंजूर नही किया जिन्होंने म्यूनिख ओलंपिक के दौरान 11 इजराइली खिलाड़ियों को बंधक बना रखा था| छापामारों को रिहा करने से इनकार कर देने पर उन 11 खिलाड़ियों को अरब आतंकवादियों ने मार डाला|इजराइल ने अपने बेशकीमती खिलाड़ियों को खो दिया|

 

उस वक़्त तो इजराइल जनहित के चलते अपने  खिलाड़ियों को बचा नही पाया लेकिन बाद में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने उन सारे षड्यंत्रकारी हमलावरों को खोज -खोज कर एक- एक कर मार डाला जो उन 11 इजराइली खिलाड़ियों की हत्या के जिम्मेवार थे|मोसाद ने करीब 20 वर्षों में इस पुरे कार्य को अंजाम दिया| हत्यारों को मोसाद ने अलग अलग देशों जैसे की इटली, फ्रांस, ब्रिटेन, लेबनान, एथेंस और साइप्रस में घुस कर मारा| इस घटना के बाद अरब-इजरायल तनाव और भी बढ़ गया था| इजरायल की जनता ने भी उसकी परवाह नहीं की|आतंकवादियों से निपटने को लेकर वहां की जनता में दो तरह की राय नहीं होती|

ये  सारा वाक्य है 5 सितंबर, 1972 का ,इजराइल के म्यूनिख में 20वां ओलंपिक खेल मेला लगा हुआ था| ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ सहित दुनिया के कई देशों की महत्वपूर्ण हस्तियां वहां उपस्थित थीं| किसी को ऐसा कोई अंदेशा भी नही था की जल्द ही इस खेल के मैदान में एक ऐसा खूनी खेल खेला जाना वाले है जो यहाँ लाशों के ढेर लगा देगा पर कुछ ऐसा ही हुआ|अरब छापामारों ने अपने कुछ साथी बंधियों की रिहाई के लिए वहां धावा बोल दिया| अरब छापामार दस्ता दीवार फांद कर ओलंपिक गांव में प्रवेश कर गये|उन्होंने मोर्चाबंदी करके इजरायली क्वार्टर पर कब्जा कर लिया| यह पुरुष खिलाड़ियों का ठिकाना था| दो इजरायली खिलाड़ियों को तो उन लोगों ने मौके पर मार भी दिया|

बाद में  एक खिलाड़ी सोश्काल्वस्की ने इस सारी घटना को ब्यान करते हुए कि “जब अरब छापामार उनके क्वार्टर में दाखिल हुए तो उनका दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था| उस खुले दरवाजे से उन्होंने गोलियां चलाना शुरू दिया| मैं भागने में सफल हुआ और खिड़की से भाग निकला और तब तक पड़ोस में छिपा रहा जब तक पश्चिम जर्मनी की पुलिस ने स्थिति को संभाल नहीं लिया| मैंने लोगों की चीख पुकार सुनी थी”|

सोश्काल्वस्की के अनुसार नकाबपोश छापामारों की संख्या नौ या दस थी|छापामारों ने नौ इजरायली खिलाड़ियों को बंधक बना लिया| वे 234 अरब छापामारों की इजरायल से रिहाई की मांग करने लगे| वे चाहते थे कि इन 234 लोगों को सुरक्षित मिस्र पहुंचा दिया जाए|स्वाभाविक ही था कि हमले की खबर से पूरा ओलंपिक गांव सनसनी और तनाव से भर उठा|इजरायल ने अपने विशेष दस्ते म्यूनिख भेजने के लिए खा पर जर्मन सरकार ने उसे अस्वीकार कर दिया. इस घटना की खबर सुनकर पश्चिम जर्मनी के प्रधानमंत्री बिली ब्रांट खुद बॉन से म्यूनिख पहुंच गए|उन्होंने छापामारों के सामने प्रस्ताव रखे कि जितना चाहें आप पैसे ले लें, पर इजरायली खिलाडि़यों को छोड़ दें, या फिर इजरायलियों की जगह जर्मनों को बंधक रख लें|

लेकिन छापामारों ने शर्तें नामंजूर कर दीं| उन्होंने कहा कि जब तक 234 छापामारों को रिहा नहीं किया जाएगा, तब तक इन्हें छोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता| जर्मन अधिकारी उनसे आग्रह करते रहे, छापेमार अपनी जिद पर अड़े रहे| इस बीच उन लोगों ने एक और धमकी दे दी.|उन्होंने कहा कि यदि एक खास समय सीमा के अंदर उनकी मांग नहीं मानी जाएगी तो वे हर दो घंटे पर एक इजरायली बंधक को मारते जाएंगे|

अरब छापामारों ने यह मांग करनी शुरू कर दी कि उन्हें बंधकों समेत किसी अरब देश में सुरक्षित भेज दिया जाए अन्यथा वे किसी भी इजरायली खिलाड़ी को जिंदा नहीं छोड़ेंगे| पर इजरायल 234 अरब छापामारों को छोड़ने को किसी कीमत पर कतई तैयार नहीं था|अंततः वे सब ओलंपिक खेल गांव की हवाई पट्टी तक बस से लाए गए| तब तक जर्मन पुलिस उस हवाई पट्टी पर हेलिकॉप्टर द्वारा पहुंचाई जा चुकी थी| पुलिस घात लगाकर बैठी हुई थी| जर्मन पुलिस ने कार्रवाई शुरू की| अरब छापामारों ने खुद को घिरा हुआ देखकर सभी इजरायली बंधकों को मार डाला|

इजरायल ने अपने बहुमूल्य खिलाड़ियों की जान की परवाह नहीं की|वह अरब छापामारों के दबाव में नहीं आया| इजरायल को यह अफसोस जरूर रहा कि पश्चिम जर्मन सरकार ने उसके विशेष पुलिस दस्ते को म्यूनिख नहीं पहुंचने दिया| बदले का इजरायल का वह बहादुराना कदम भारत जैसे आतंक पीड़ित देश के लिए एक खास सबक बन सकता है|

म्यूनिख में इन खिलाड़ियों का समरक बनाया है|इन बहादुर खिलाड़ियों को अपनी जान की आहुति देनी पड़ी |

 

 

 

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