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माउंटेन मैन “दशरथ माँझी” का जज़्बा जिसने ताजमहल को भी मात दे दी| जरुर पढ़े !!!

ताजमहल के बारे में तो पूरी दुनिया जानती है पर क्या कोई जानता है इस गरीब दशरथ मांझी के बारे में| इस गरीब भूमिहीन मजदूर दशरथ माझी ने ते वो कर दिखाया जिसने शहनशाह के सामने चुनोती रख दी|

अपने दो हाथों की ताकत के सहारे उन्होंने अपने ख़्वाब को पूरा कर दिखाया|पत्नी फाल्गुनी देवी के प्रेम से प्रेरणा मिली तो अपने दोनों हाथों की ताकत के सहारे 300 फूट ऊँचे पहाड़ को काटकर 360 फूट लम्बा और 30 फूट चौड़ा रास्ता बना डाला |

दशरथ ने अपना लक्ष तय किया की एक वक़्त में एक पत्थर तोड़ना है फिर आगे बड़ना है| उन सभी पत्थरों को तोड़ना था जो पत्नी के रास्ते में आड़े आये थे और जिनकी वजह से वो पहाड़ की दरार से गुज़रते वक़्त फिसल कर गिर गयी थी और घायल भी हो गयी थी| उनकी पत्नी की मौत दवाइयों के अभाव में हो गई, क्योंकि बाजार दूर था। समय पर दवा नहीं मिल सकी। यह बात उनके मन में घर कर गई|

ये पूरा वाक्य 1962 में बिहार के एक गाँव गहलौर में घटित हुआ| गहलौर गया जिले के दूरस्थ और पहाड़ों के बीच घिरा हुआ रास्ता है| गहलौर से वज़ीरगंज की दूरी पहले 70 किलोमीटर थी और ये रास्ता घुमावदार था|पर अब ये दूरी दशरथ की मोहब्बत और मेहनत ने मिटा दी है| अब महज ये 15 किलोमीटर रहगयी है|

 

इस रास्ते को बनाने में पुरे 22 साल लगे और दशरथ का साथ देने वाला कोई नही था| उन्होंने बताया था, “जब मैंने पहाड़ी तोड़ना शुरू किया तो लोगों ने मुझे पागल कहा लेकिन इसने मेरे निश्चय को और मजबूत किया। अगर कोई तो वो था सिर्फ छेनी और हथोड़ा|1984 में ये पूरा हुआ पर तब दशरथ की विजय यात्रा का सुख महसूस करने के लिए उनकी पत्नी उनके साथ नही थी जिसके वजह से उन्होंने ये कदम उठाया था पर पुरे समुदाय को सुखी पाकर उन्हें बहुत आराम मिलता है |उन्होंने कहा है की उनके इस एक परिश्रम से लाखों जनता को राहत मिली है और इसलिए वे बेहद खुश है|

इस उपलब्धि से दशरथ लोकगीतों के नायक बनगए | बिहार सरकार ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्म श्री हेतु उनके नाम का प्रस्ताव रखा। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दशरथ मांझी के नाम पर  गहलौर से 3 किमी पक्की सड़क का और गहलौर गांव में उनके नाम पर एक अस्पताल के निर्माण का प्रस्ताव रखा था|हालांकि सरकार उनके जीते जी तो कुछ नही कर सकी पर मरने के बाद सम्मान जरुर दिया|

 

दशरथ की ये सड़क शायद दुनिया की अनूठी सड़क होगी जिसे किसी श्रमिक ने अपने हाथों से गड़ा हो,शायद इसी कारण कथाकार शवाल ने कहा

“ये पहाड़ी रास्ता किसी क्रांति का रास्ता प्रतीत होता है क्यूंकि समूह का प्रेम ही क्रान्ति है

तुम सोचते हो बोल देने से होता है प्रेम, मैं सोचता हूँ उसे उदित होने दो तुम्हारे अन्दर

चड़ने दो आसमान पर, चुप रहो और बोलो अपनी चुप्पी में

लड़ों पर प्रेम करो सारी श्रृष्टि से सारे समुदाए से, प्रेम नही बोलता

क्रान्ति महज इतना नही है की उठालो सशत्र या बोल दो नारा

प्रेम करना सीखो जैसे ये श्वेत पुष्प जीना सीखता है रक्त के समुदाए के साथ मेरे भीतर “

साल 2007 में  73 बरस की उम्र में वो जब दुनिया छोड़ गए, तो पीछे रह गई पहाड़ पर लिखी उनकी वो कहानी, जो आने वाली कई पीढ़ियों को सबक सिखाती रहेगी| दशरथ माझी इंसानी जज्‍़बे और जुनून की मिसाल है| उनकी दीवानगी, जो प्रेम की खातिर ज़िद में बदली और तब तक चैन से नहीं बैठी, जब तक कि पहाड़ का सीना चीर दिया,उनके इसी आक्रोश ने लोगों को प्रेरित कर दिया की अगर इंसान ज़िन्दगी में कुछ करने की ठान ले तो उसके लिए कुछ असंभव नही|

कुछ इसी पथ पर चलते हुए आज ओडिशा से एक उदहारण सामने  आया है, जहां जालंधर नायक ने अकेले ही कंधमाल जिले में पहाड़ काटकर, 8 किमी लंबी सड़क बना दी और देश के सामने एक मिसाल पेश की है|

नायक ने ओडिशा के कंधमाल जिले के फूलबनी शहर में मुख्य सड़क के साथ अपने गांव गमसाही से जुड़े रास्ते को बनने के लिए हर दिन कम से कम आठ घंटे काम करते थे|नायक ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि उसके बच्चे को शहर में स्थित स्कूल में जाने कोई दिक्कत ना हो|

 

सरकार को चाहिए की वे इन लोगों को और इनके परिवारों को वो सारी सुविधाएं प्राप्त करवाए जिनसे आज तक ये ,इनके परिवार और गाँव वंचित है|

इन महान शख्सियतों को हमारी और से शत शत नमन!!!

 

 

 

 

 

 

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