संस्कृति

महाराणा कुम्भा एक ऐसा वीर योद्धा जिसने 30 साल के अपने शाषण में कभी कोई युद्ध नही हारा

 

हुरा से खैरबारा तक ,कुम्भलगढ़ से चित्तोड़गढ़ तक फैला 1500 साल पुराना दुनिया के सबसे प्राचीन साम्राज्यों में से एक है मेवाड़|यहाँ के राजा सुर्यवंष से थे यानि स्वयं भगवान् राम के वंशज माने जाते है|मेवाड़ की परम्परा के मुताबिक पूरी दुनिया के राजा भगवान् शिव है और वहां के राम होते है रियासत के अभिरक्षक और हर सुबह राणा की पहली मुलाकात होती थी अपने राजा यानि भगवान् शिव के साथ|

महराणा कुम्भा या महाराणा कुम्भकर्ण वर्ष 1433 से 1468 तक तक मेवाड़ के राजा थे। महाराणा कुंभकर्ण का भारत के राजाओं में बहुत ऊँचा स्थान है। उनसे पूर्व राजपूत केवल अपनी स्वतंत्रता की जहाँ-तहाँ रक्षा कर सके थे पर महाराणा कुंभकर्ण ने मुसलमानों को अपने-अपने स्थानों पर हराकर राजपूती राजनीति को एक नया रूप दिया था|

सत्ता हासिल करने के सात साल के अन्दर ही उन्होंने सहारनपुर,नागौर,नराना,अजमेर,मंडूर,मोंडलगढ़,बूंदी,खाटू,आदि कई किल्लों को जीत लिया था|सिर्फ यही नही राणा ने दिल्ली के सुलतान सईद मुहम्मद शाह और गुजरात के अहमद शाह को बुरी तरह पराजित किया था और कमाल की बात तो देखिये दुश्मन महराना कुम्भा पर सामने से हमला करते थे लेकिन उनको हार का मुहं ही देखना पड़ता था|महाराणा बड़ी आसानी से उन्हें हरा देते थे|

उनके शत्रुओं ने अपनी पराजयों का बदला लेने का बार-बार प्रयत्न किया, किंतु उन्हें सफलता न मिली। मालवा के सुलतान ने पांच बार मेवाड़ पर आक्रमण किया। नागौर के स्वामी शम्स खाँ ने गुजरात की सहायता से स्वतंत्र होने का विफल प्रयत्न किया। यही दशा आबू के देवड़ों की भी हुई। मालवा और गुजरात के सुलतानों ने मिलकर महाराणा पर आक्रमण किया किंतु मुसलमानी सेनाएँ फिर परास्त हुई।महाराणा ने अन्य अनेक विजय भी प्राप्त किए। उसने डीडवाना(नागौर) की नमक की खान से कर लिया और खंडेला,आमेर,रणथंभोर,  डूँगरपुर, सीहारे आदि स्थानों को जीता। इस प्रकार राजस्थान का अधिकांश और गुजरात, मालवा और दिल्ली के कुछ भाग जीतकर उसने मेवाड़ को महाराज्य बना दिया ।

महाराणा कुंभा राजस्थान के शासकों में सर्वश्रेष्ठ थे। मेवाड़ के आसपास जो उद्धत राज्य थे, उन पर उन्होंने अपना आधिपत्य स्थापित किया। 35 वर्ष की अल्पायु में राजस्थान के 84 में से 32 दुर्गों उनके द्वारा बनवाए गए जिनमे चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़ जहां सशक्त स्थापत्य में शीर्षस्थ हैं, वहीं इन पर्वत-दुर्गों में चमत्कृत करने वाले देवालय भी हैं। उनकी विजयों का गुणगान करता विश्वविख्यात विजय स्तंभ भारत की अमूल्य धरोहर है जिसका निर्माण गुजरात और मालवा की सेना का नेतृत्व  कर रहे महमूद खिलजी को बुरी तरह पराजित कर के उसके ऊपर प्राप्त हुई विजय की  याद में बनवाया था|

कुंभा का इतिहास केवल युद्धों में विजय तक सीमित नहीं थी बल्कि उनकी शक्ति और संगठन क्षमता के साथ-साथ उनकी रचनात्मकता भी आश्चर्यजनक थी। ‘संगीत राज’ उनकी महान रचना है जिसे साहित्य का कीर्ति स्तंभ माना जाता है।हिन्दुस्तान का एक ऐसा योद्धा  जिसने रण में कौशल दिखाने के साथ साथ साहित्य और संस्कृति में पुरे राजपूताने को एक अलग पहचान दी| कुंभलगढ़ का प्रसिद्ध किला उनकी कृति है। बंसतपुर को उन्होंने पुन: बसाया और श्री एकलिंग के मंदिर का जीर्णोंद्वार किया|आज अगर विदेशी राजस्थान में घुमने आते है यहाँ की संस्कृति के दर्शन करते है तो उसमे सबसे बड़ा हाथ महाराणा कुम्भा का है|

कहते है जो इंसान किसी से नही हारता कभी कभी उसके अपने ही उसे हरा देते है|ऐसा ही कुछ राणा कुम्भा के साथ भी हुआ|राणा कुम्भा अपने 30 साल के शाशन में एक भी युद्ध नही हारे थे पर उनको उनकी खुद की औलाद ने ही हरा दिया|वो बेटा जिसको उन्होंने पाल पोस के बड़ा किया और उसे अपनी तरह महान योधा बनाने के लिए तयार कर रहे थे उसी बेटे उदय की राज सिंहासन पे बैठने की लालसा बड़ती जा रही थी और धैर्य कम होता जा रहा था कि अचानक फिर उस सुबह कुछ ऐसा घटित हुआ जिसने मेवाड़ की आने वाली नस्लों की गर्दन हमेशा के लिए नीची करदी|उसने अपने पिता का ही वध करदिया और खुद गद्दी पर बैठ गया|इतिहास में उदय को “मर्डरर” नामक दूसरा नाम दिया गया है और उदय सिंह मेवाड़ के इतिहास पे एक बड़ा धब्बा है|

 

 

 

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