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भारत के मंदिरॊं के वास्तु कला में छुपी चमत्कार के पीछे का रहस्य जिसे आज तक कॊई नहीं भेद पाया।

भारत रहस्यॊं की खदान है। भारत की गॊद में अनगिनत रहस्य छुपे हैं। सदियों से ही भारत की वास्तु कला निपुणता विश्व भर में प्रसिद्द है और बड़े बड़े  वैज्ञानिक, इतिहासकार और तकनीकी विशेषज्ञ इसे भेदने में असफल रहे हैं। हमारे देश में ऐसे कई मंदिर और स्मारक है जिसको असीम तंत्रज्ञान से निर्मित किया गया है। सदियों पूर्व बनाई गये इन स्मारकों का रहस्य आज तक कॊई खॊज नहीं पाया है।

ऐसा ही एक मंदिर है आंध्र प्रदेश में स्थित लेपाक्षी मंदिर। लेपाक्षी आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में स्थित एक छोटा सा गांव है। इस मंदिर के आंगन में एक लटकता हुआ स्तंभ है। यह मंदिर कछुए के खोल की तरह बने एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है इसलिए यह कूर्म सैला बी कहा जाता है। मंदिर 16 वीं सदी में विजयनगर के काल में बनाया गया है। इस मंदिर का सबसे चमत्कारी विषय एक पत्थर का खंभा है। 27 फुट लम्बा और 15 फुट ऊंचा नक्काशीदार स्तंभ हवा में लटकता है! ऐसा ही एक स्तंभ बेलूरू -हलेबीडू में दिखाई पड़ता है जो हवा में लटकता है। इस खंभों के नीचे से कागज़ या पतले कपदे को सरकाया जा सकता है। पृथ्वी के गुरुत्व आकर्षण की शक्ति को मात देते हुए हवा में लटकते हुए यह स्तंभ विज्ञान के लिए सवाल खड़ा कर रहे हैं।

विजयनगर के काल में वास्तुकला का अद्भुत निदर्शन देखने को मिलता है। ऐसा प्रतीत हॊता है कि आधुनिक तकनीक के औज़ारॊं के उपयॊग से इन मंदिर और स्मारकों को बनाया गया है। हंम्पी में ऐसे स्तंभ है जिनसे आप संगीत के नाद स्वर को सुन सकते हैं। उस स्तंभ हल्के हाथॊं से मारने से आपको संगीत के सुर सुनाई देते हैं! ठीक इसी प्रकार तमिलनाडु के कुम्भकॊणं में 12वीं सदी के ऐरावतेशवर मंदिर की सीढियों में भी संगीत के सुर सुनाई देते हैं। इस मंदिर के साथ सीढ़ियॊं मे संगीत के साथ सुर सुनाई देते है! यह वास्तुकला का चमत्कार ही है।

आश्चर्य की बात यह है की सदियों पूर्व ऐसे अद्भुत वास्तु कला बनाने की तकनीक हमें कहां से प्राप्त हुई थी। मानव मात्र से केवल छेनी हथॊडे से ऐसे कलाकृतियां बनाना संभव ही नहीं है। निस्संदेह हमारे पूर्वजॊं के पास यंत्र-तंत्र के अद्भुत ज्ञान होगें जो समकालीन मशीनों के जैसे ही दिखते और कार्य करते होंगें। लेकिन कालानुक्रम में किसी कारण वश वह तकनीक विलुप्त हो गयी है।  विशेष कर दक्षिण भारत में वास्तुकला का अद्भुत निदर्शन देखने को मिलता है। यहां के मंदिर के गॊपुर विमान के के आकार के हैं और इन्हें विमान मंदिर भी कहा जाता है।

तमिलनाडू के रामेश्वरम में 1740 वर्ष पूर्व बनाया गया एक मंदिर है जिसके 1212 खंभे एक ही बिंदु में जाकर मिलते हैं। सबसे रहस्यमयी और चमत्कारिक वास्तु कला तो अजंता और एल्लॊरा में देखने को मिलते हैं। द्वितीय शताब्दी में बनाई गयी ये गुफाएं महाराष्ट्र में स्थित हैं। एलॊरा का कैलाश मंदिर के रहस्य को तो आधुनिक तकनीक भी भेद नहीं पाया। इस मंदिर को एक पहाड़ के शीर्ष को ऊपर से नीचे काटते हुए बनाया गया है। जैसे एक मूर्तिकार एक पत्थर से मूर्ति तराशता है, वैसे ही एक पहाड़ को तराशते हुए इस मंदिर को बनाया गया है। वैज्ञानिक भी कैलाश मंदिर की बनावट को देखकर आश्चर्य चकित है कि इस की रचना आखिर किया कैसे हैं।

भारत में ऐसे कई गुफ़ाएं हैं जिनकी ऊपरी सतह आईने की ही तरह चमकीली और फिसड्डी है। इनको देखने से ऐसा प्रतीत होता है की मानो इन्हें उच्च कॊटी के लेसर तकनीक द्वारा बनाया गया हो। क्यॊंकि बिना किसी तकनीक के केवल मानव मात्र से छेनी-हथोड़े से ऐसे कला का निर्माण करना कल्पना से परह है। निश्चय ही हमारे पूर्वजॊं के पास आधुनिक तकनीक होगें जिससे उन्होंने ऐसे चमात्कारिक वास्तु कलाओं का निर्माण किया है।

इतिहासकार, संशॊधनकर्ता और वैज्ञानिक यह अनुमान लगाते हैं की भारत के इन स्मारकॊं को या तो अन्य ग्रह जीवियॊं ने बनाया है या फिर हमारे पूर्वजॊं के पास ऐसी तकनीक थी जिसके सहायता से अद्भुत मंदिरॊं का निर्माण किया है जिनकी रहस्य को आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है। हमारी वास्तुकला हमारी धरॊहर है और हमारे पूर्वजॊं की बुद्दिमत्ता की निशानी है। इसे संजॊये रखना हमारा कर्तव्य है।

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