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भगवान श्री कृष्ण की कर्म भूमी द्वारका नगरी की कहानी जिसे हर हिन्दू को जानना चाहिए।

पूरे ब्रह्मांड के कण कण में कृष्ण का अस्तित्व है। ब्रह्मांड की रचना भी कृष्ण रंध्र से ही हुई है। भारत, सदियॊं से ही समूचे ब्रह्मांड में सनातन धर्म की प्रतिनिधित्व करनेवाला देश रहा है। ऐसे भरत भूमी में कृष्ण का जन्म हुआ है। वह कृष्ण जिसने पृथ्वी को ‘भगवद गीता’ का उपहार दिया। कृष्ण एक अद्भुत, अलौकिक और अप्रतिम प्रेममई व्यक्ती जिसने कर्म व फल का सार, धर्म और अधर्म का भेद सामान्य मनुष्य को दर्शाया। दुनिया का सबसे पहला दार्शनिक, तत्वज्ञानी, प्रेरणा स्त्रॊत कृष्ण जिसे दुनिया के कॊने कॊने में पूजा जाता है।

मथुरा जने कृष्ण की कर्म भूमी रही है द्वारका। द्वारका जिसका उल्लेख महाभारत में किया गया है जिसका अर्थ है स्वर्ग का द्वार। सत्य ही है जहाँ कृष्ण निवास करते हो वह किसी स्वर्ग से कम तो नहीं होगा। जिस द्वारका का प्रस्ताव महाभारत में हुआ है उसका अस्तित्व का पता तब चला जब भारतीय पुरातत्विक सर्वेक्षण संस्था ने समुंदर के भीतर इस खॊई हुई नगरी का अस्तित्व पाया। भारतीय नौसेना और पुरातत्व संस्था साथ मिल्कर इस खॊये हुए द्वारका के रहस्य को भेद ने का प्रयत्न कर रहे है।

द्वारका नगरी को कृष्ण ने समुद्र के बीचॊ बीच बनाया था। किन्तु निरंतर लेहरॊं की लपटॊं के प्रहार से द्वारका ६ बार द्वस्त हुई थी और जो अवशेष आज प्राप्त हुए हैं वह इस बात पर प्रकाश डालते हैं की इस नगरी को कृष्ण ने ७ वी बार पुनः बनवाया था। कैसी रही हॊगी वह तकनीक जो समुंदर के बीच में एक नगरी को बनाती थी और कितने असाधारण व्यक्ती होंगे भगवान कृष्ण! द्वारका नगरी समुंदर के तल में १२० फीट नीचे पाई गयी है। महाभारत में उल्लेख है की जैसे ही कृष्ण का महाप्रस्थान द्वारका से हुआ उसी समय द्वारका समंदर में डूब गई थी।

जो अवशेष द्वारका से प्राप्त हुए हैं उनकी कार्बन डेटिंग से यही पता लगता है की यह नगरी कम से कम ९.५ हज़ार साल पुरानी है। यहाँ तरह तरह के शिलाखंड प्राप्त हुए हैं। यह अतिविशाल काय नगरी है। माना जाता है की यह करीब ४० मीटर लंबी जगह में फैली हुई हॊगी। १९८३ से ही द्वारका का उत्खनन किया जा रहा है। भारत की समुद्रविज्ञान संस्था ने इसका ज़िम्मा अपने हाथॊं मे लिया हुआ है। जाने माने पुरातत्व शात्रज्ञ एस.आर.राव के नेत्रुत्व में वर्षॊं से इस नगरी का उत्खनन कार्य चल रहा है। एस.आर.राव ने भारत में हरप्पन नागरिकता का प्रमाण एकत्रित करने में भी बडी भूमिका निभाई है।

मध्य प्रदेश के विदिशा के एक मंदिर के उत्खनन के समय कृष्ण, बलराम, प्रद्युमन और सात्यकी से जुडे हुए फ्लेग्स्टाफ़ पाये गये हैं जो ३०० बीसी से पुराने हैं। ५७४ एडी में पाई गई समन्त सिम्हादित्य नामक शिला लेख में द्वारका नगरी का उल्लेख है और कहा गया है की द्वारका नगरी सौराष्ट्र की राजधानी हुआ करती थी और भगवान कृष्ण यहाँ निवास करते थे।

द्वारका के ३०कीमी उत्तर की ओर बेट द्वारका में एक टापू है जिसे कृष्ण की विलास स्थल के रूप में जाना जाता है। द्वराका में पथर की दीवार है जो की १ मील से भी लंबी अंतज्व्रारिय क्षेत्र में है। इसके दक्षिण की ओर एक द्वार है जो जहाजॊं की आवा गमन के लिये बनाई गयी है। समंदर के नीचे ११.२, ४.६, १.३४मीटर के अंतर पर तीन प्लाबित भूमी के त्रिपाद भी दिखाई पडते हैं। विश्वकर्मा की वास्तुकला की अद्भुत निशानी है द्वारका नगरी। भारत सदियों पूर्व ही वैज्ञानिक तकनीकॊं का उपयॊग करता था। इसका अती उत्तम उदाहरण द्वारका नगरी है ।

राव अनुमान लगाते हैं की द्वारका नगरी भारत की सबसे बडी बंदरगाह रही हॊगी। पत्थर से बने करीब ५० लंगर द्वारका से प्राप्त हुई है। यह इस बात का साक्ष्य है की कई छॊटे और बडे जहाज गॊमती घाट से द्वारका नगरी तक आवा गमन करते थे। द्वारका नगरी को बडी ही अद्भुत क्रम से बनाया गया है। समलंबाकार के पत्थरॊं को एक के ऊपर एक समानांतर रूप से रखकर बनाया गया है जिसके बीच में छॊटे छोटे पत्थर के टुकडॊं को लगाया गया है। यह बाहरी दीवार इस तरह से बनाया गया है की अंदर की नगरी को समुंदर के लहरॊं से क्षती न पहुँचे। अनुमान है की यह नगरी प्रलय के समय समंदर के नीचे डूब गयी होगी।

द्वारका में प्राप्त सभी वस्तुएं इसी ओर अनुमान लगाते हैं की कृष्ण एक काल्पनिक व्यक्ती नहीं थे और ना ही महाभारत केवल एक महाकाव्य है। अपितु महाभारत के सभी पात्र और घटना वास्तव में घटी है। द्वारका में उत्खनन का कार्य अब भी जारी है। आज नहीं तो कल सत्य का उजागर होना ही है। भारतीय सनातन धर्म की गौरवशाली इतिहास का साक्ष्य है द्वारका नगरी। आशा करते हैं की द्वारका से जुडे सारे तथ्य और सत्य का उजागर जल्द ही हो।


Sharon Shetty

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