अर्थव्यवस्था

जानिए आखिर पेट्रोल और डीज़ल को जीएसटी की कक्षा में लाने में सरकार को क्या कठिनाई आ रही है?

 

कई लोगों के मन में यह सवाल कई समय से आ रहा है की अंतराष्ट्रीय बाज़ार में पेट्रॊल और डीज़ल के कच्चे तेल के दामों में गिरावट आने के बाद भी भारत में पेट्रॊल और डीज़ल के दाम कम क्यों नहीं है? साथ ही साथ पेट्रॊल और डीज़ल के ऊपर जीएसटी लागू क्यों नहीं किया गया है। यह सत्य है कि पेट्रोल और डीज़ल की दाम गिरने से या उसे जीएसटी के अंदर लाने से देश के आम नागरिकों का जेब का बोज़ हल्का होगा, लेकिन यह भी सत्य है कि सरकार के कंधों पर बहुत सारा बोज़ बढ़ेगा।

अंतराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम गिरने के बावजूद भारत में तेल के दामों में  कटौती नहीं की गयी क्यों की पेट्रॊल और डीज़ल की बिकरी से आने वाली एक्साईस ड्यूटी से ही भारत सरकार को बड़ी रकम मिलती है जिसे वह भारत के मूलभूत ढांचे को सुधारने में डाल रही थी। ये जो आज देश के राष्ट्रीय राजमार्गों का काम इतनी तेज़ी से बड़ रहा है इसका पैसा एक्साईस ड्यूटी से ही आता है। 2016 में तेल के ऊपर की एक्साइस ड्यूटी के कारण सरकार को 1.5 लाख करोड़ रूपए का आय मिला था जिसे मोदी सरकार ने विकास के कामों में लगा दिया था।

इसके पहले की सरकार ने घॊटाले करके देश का पैसा विदेशी बैंको में जमा किया था इसी कारण देश के खज़ाने में एक कौड़ी नहीं बची थी। मोदी जी ने जब सत्ता संभाली थी उनके सर पर करोड़ों का विदेशी कर्ज़ा था जिन्हें इस वर्ष के अंत तक चुकाना था। देश में प्रगती लाना और देश का विदेशी कर्जा चुकाना हो और खज़ाना एक दम खाली हो तो इन्सान करे भी तो क्या करे। जो पैसा पेट्रोल और डीज़ल की बिकरी से मिला उसे मॊदी सरकार ने विकास के कामों में लगा दिया और ईरान के कर्ज़ का एक हिस्सा तुरंत चुका दिया।

देश के सर पर कर्ज़ का बोज़ टला नहीं है। अल्प कालिक और दीर्घ कालिक कर्ज़ को अभी हमें चुकाना है। 2016 में देश का कुल विदेशी कर्ज दिसंबर अंत तक पिछले साल मार्च अंत की तुलना में मामूली बढ़कर 480.2 अरब डॉलर (करीब 317 खरब रुपये) पर पहुंच गया था। मार्च अंत की तुलना में दिसंबर अंत तक कुल विदेशी कर्ज में 4.9 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई थी। सरकार का सॉवरन फॉरन ऋण दिसंबर अंत तक 90.7 अरब डॉलर पर था जबकि गैर सरकारी ऋण 389.5 अरब डॉलर पर था। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का विदेशी कर्ज प्रबंधन योग्य सीमा में है।

भारत के ऊपर खरबों का कर्ज़ा है जिसे चुकाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं है और उसके ऊपर यूपीए के कुशासन से देश के खज़ाने को करोड़ों का नुकसान भी हुआ है। मोदी जी ने सरकार के सारे नीलामी प्रक्रिया को ऒनलाइन कर दिया। इसके बाद देश के पैसे का बड़ा हिस्सा जो घॊटालों के ज़रिए नेता लोगों की जेब में जा रहा था आज वह सीधे सरकार के खज़ाने में आ रहा है।

मोदी जी दो धारी तलवार के ऊपर चल रहे हैं पेट्रॊल और डीजल को जीएसटी के अंतर्गत लाया गया तो सरकार का नुकसान होगा जिससे विकास के कामों को तेज़ी से निपटाया नहीं जा सकता और ना ही जल्द से जल्द विदेशी कर्ज़ों को चुकाया जा सकता है। बावजूद इसके पिछले हफ़्ते वित्त मंत्री ने इस मसले से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए साफ कहा है की पेट्रोल एवं डीजल भी जीएसटी कक्षा में लाए जाए, ऐसी सरकार की इच्छा है। जीएसटी के कानून में पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी की कक्षा से बाहर नहीं रखा जाएगा। पर उस के लिए विभिन्न राज्यों की मंजूरी होना, यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है।

उन्होंने कहा की राज्य सरकारों से केंद्रीय कर के व्यतिरिक्त पेट्रोल और डीजल पर अन्य कर जारी है। जेटली जी ने कहा की राज्यों  को इस कर को कम करने की सूचना दी गयी है। अगर पेट्रोल और डीजल को जीएसटी कक्षा में लाना है तो उसमें राज्य सरकारों की अनुमती आवश्यक है। पेट्रॊल और डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने में राज्यों से देरी हो रही है। क्यों कि जीएसटी काउंसिल में सभी राज्य अपना प्रतिनिधित्व करते है।

पेट्रोल डीजल को जीएसटी की कक्षा में लाने के लिए जीएसटी काउंसिल में 75 प्रतिशत राज्यों का सहमत होना अनिवार्य है। यधपि  अधिकतम राज्यों ने इस निर्णय के प्रति अपनी सहमति व्यक्त की तभी पेट्रोल और डिज़ल को जीएसटी में लाना संभव है। इस विषय पर केंद्रीय वित्तमंत्री जेटली जी ने ध्यान आकर्षित करते हुए साफ कर दिया है कि केंन्द्र सरकार को इस विषय में कॊई आपत्ति नहीं है। देश में जीएसटी लागू होने के बाद से अब तक जीएसटी काउंसिल में हुए सभी निर्णय 100 प्रतिशत राज्यों की सहमति से ही मंजूर हुए है। इसलिए केंन्द्र सरकार चाहती है कि इस विषय में भी सर्व सम्मति  से ही निर्णय लिया जाए।

अपने ऊपर बोज़ लेकर भी मोदी सरकार पेट्रॊल और डीज़ल को जीएसटी के अंतर्गत लाने को तय्यार है। साथ ही साथ सऊदी में आज कल हो रहे राजकीय बदलाव के वजह से आनेवाले दिनों में भारत को बाहर से पेट्रॊल और डीज़ल ज्यादा दाम में खरीद कर कम दाम बेचना पड़ सकता है। इससे सरकार को बहुत बड़ा वित्तीय घाटा भी हो सकता है। अनुमान है की तेल की कीमतों मे लगाए जाने वाले कर में 1 रूपए का घाटा भी सरकार को 13 हज़ार करोड़ का नुकसान करा सकता है। ऐसे में विकास के कामों में रफ्तार बनाए रखना और देश का कर्ज़ चुकाना कठिन हो जाएगा।

मॊदी सरकार का उद्देश्य है कि देश का विकास तेज़ी से हो और इसलिए वह हर संभव प्रयास कर रही है। मॊदी जी के लिए यह परीक्षा की घड़ी है और हमारे लिए भी कि हम अपने देश के कठिंन समय में मोदी जी के साथ खड़े रहते है या नहीं। विरॊधियों की चाल है कि जीएसटी, नॊटबंदी और पेट्रॊल-डीजल के विषय में झूठ फैलाकर जनता को मोदी जी के खिलाफ भड़काए। अब यह जनता पर निर्भर करता है की वे झूठ को ही सच मानेंगे या फिर सच की जड़ तक पहुंचने का प्रयत्न करेंगे।

Source
Trading Economics
Tags

Related Articles