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कड़ी निंदा मंत्री का माओवादियों पर हमला

भारतीय गणतंत्र के वैसे तो बहुत से शत्रु रहे है पर इनमे माओवादी सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है …इन लोगो का कब्जा भारत के बड़े भूभाग पर रहा है और अब ये धीरे धीरे शहरी क्षेत्रों को निशाना बना रहे है । पिछले कुछ वर्षों में ये लोग भारतीय सरकारी तंत्र और सशस्त्र सेनाओं के विरुद्ध एक छद्म युद्ध लड़ रहे है बड़े ही आक्रामक तरीके से इन कार्यवाई को अंजाम भी देते है।

ऐसे कई उदाहरण है जिसमे माओ आतंकवादियो ने घात लगाकर सेना पर हमले किये जिसके चलते कई सैनिक और अधिकारी असमय काल कवलित हुए तथा इन हमलों में सामान्य नगरिक भी मारे गए।

वर्तमान सरकार एक बड़ा जनादेश लेकर आई जिससे माओवाद पर नियंत्रण होगा ऐसा लोगो में विश्वास पैदा हुआ है और मोदी सरकार ऐसा कर भी रही है।

लेकिन कई मौके ऐसे भी आये जब सरकार ने इन जघन्य अपराधों पर सिर्फ कड़ी निंदा की जिसका परिणाम ये निकला की केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह पक्ष और विपक्ष के निशाने पर आ गए …. जनता ने मोदी सरकार के मंत्रियों से “कड़ी निंदा” जैसे जुमलो की उम्मीद नही की थी और न ही इतने लचर व्यवहार की जब 20 से 25 जवान एक साथ आतंकी हमलों में शहीद हो जाते हो … जनता में रोष फ़ैल गया और सरकार और ग्रहमंत्री की जोरो से भर्त्सना होने लगी…ग्रहमंत्री राजनाथ सिंह को “कड़ी निंदा मंत्री” “निंदा नाथ”या “कड़ी निंदा मैंन” तक खा जाने लगा । ऐसे सोशल मीडिया के साथ साथ मुख्यधारा की मीडिया में भी होने लगा । ये सिक्के का एक पहलू था जिसमे राजनाथ सिंह और मोदी सरकार एक साथ अपराधियो की तरह कटघरे में खड़ी दिखाई देती है।

लेकिन सिक्के दूसरा पहलू कुछ और कहानी बयान करता है। अगर हम आंकड़े देखे तो स्थिति बिलकुल उलट हो जाती है,भारत सरकार और ग्रहमंत्रालय के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार 2010 से 2016 के बीच माओवादी हिंसक घटनाओं के बीच 52.6% की गिरावट आयी है।

माओवादियों ने खुद स्वीकार किया है कि मोदी सरकार ने जबरदस्त झटका देते हुए उनकी रीढ़ तोड़ दी है जैसे पहले कभी नही हुआ है, और उन लोगो का मनोबल पूरी तरह से टूट चुका है।

इन आंकड़ों के अनुसार 2016 2017 के बीच माओवादी घटनाओ में 22.5% की कमी आयी है।इसके अलावा पुलिस ने लगभग 625 आगजनी,लूट,हत्या से सम्बंधित केस दर्ज किये जबकि 2016 व् इससे पूर्व इनकी संख्या 807 थी।

हाल ही में आयोजित एक समीक्षा बैठक में कम्युनिस्ट पार्टी(माओवादी) जो वामपंथियों को चरमपंथी आंदोलन के लिए प्रेरित करती है ने ये निष्कर्ष निकाला की उनके सशस्त्र संघर्ष बड़े ही मुश्किल दौर से गुजर रहे है। भारत में लगभग 16 माओवादी गढ़ है और उनका ये आंदोलन अपनी पकड़ खो चुका है। माओवादी घटनाओं में कमी आने का मुख्य कारण वामपंथी उग्रवादी समूहों पर केंद्र सरकार की अत्यंत कठोर कार्यवाही होना माना जा रहा है।
2016 में माओवादियों की पुलिस से मुठभेड़ की घटाओ में 20.5% वृद्धि हुई है जबकि वर्ष 2010 में ये मात्र 210 ही थी और 2016 में बढ़कर ये 328 एनकाउंटर व् कार्यवाहियो तक पहुंच गयी।

ग्रहमंत्रालय के अनुसार 2010 से 2017 के बीच मरने वाले माओ आतंकवादियो की संख्या,आत्मसमर्पण और हथियारों के बरामद होने के घटनाओं में बड़ी तेजी देखी गयी… जो की 2016 के दौरान अपने चरम।पर थी।

2010 की तुलना में 2016 में लगभग 442% अधिक माओ उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया है… पुलिस पर होने वाले हमलों में लगभग 75% की कमी आयी है । वर्ष 2010 में इन हमलों की संख्या 230 थी जबकि 2017 में मात्र 58 ही रह गयी।

मोदी सरकार की त्वरित कार्यवाई व् आतंकविरोधी नीतियों से माओवाद कइ फैलाव पर रोकथाम हुयी है व माओवादियों के अड्डो को निष्क्रिय भी किया गया है । जो माओवाद पिछले दशक में अपने चरम पर था आज वो अंतिम साँसे ले रहा है । माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अभेद्य माने जाने वाले इलाको में सरकार की कार्यवाइयों का प्रबल प्रभाव पड़ा है ।माओवादियों को एक विश्लेषण के अनुसार पंजाब,हरियाणा,उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में पार्टी अपनी पकड़ खो चुकी है यहां तक की बिहार,झारखण्ड और असम जैसे राज्यो में ये पार्टी बुरी तरह से असफल हो कर कमजोर होती जा रही है।

छत्तीसगढ़ का दण्डकारण्य क्षेत्र जो कभी माओवादियों का अटूट साम्राज्य माना जाता था आज वो वामपंथियों के लिए मुश्किल व् असाध्य घोषित हो चुका है। आंध्र प्रदेश,उड़ीसा और तेलंगाना जैसे अन्य राज्यो को माओवादी पार्टी के लिए अत्यंत कमजोर राज्यो की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। केरल,कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यो में माओवादी आंदोलन की स्थिति विकट हो चली है।

माओवादी में युवा नेतृत्व की कमी : भारत में माओवादी आंदोलन को चलाने वाले नेता अब उम्रदराज हो चले है उन्हें युवा शक्ति की जरूरत है और बुजुर्ग और उम्रदराज नेता अपना प्रभाव बरकरार नही रख पाने के कारण हाशिये पर चले गए है। केंद्रीय समिति के 19 सदस्यों में से 7 सदस्य 60 वर्ष को पार कर चुके है,कुछ सदस्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे है,पार्टी के महासचिव मुपल्ला लक्ष्मण राव जो गणपति के नाम से जाने जाते है 66 वर्ष के हो गए है और टीम के वरिष्ठ नेता प्रशांत बोस 69 बसन्त देख चुके है।

फरवरी 2017 की एक बैठक में एक फैसला लिया गया जिसमें जंगलो में दूर दराज के इलाको में सभी स्तरों पर कार्यरत वरिष्ठ नेताओं को इन आंदोलन से वापस बुलाने का निर्णय लिया गया हालाँकि पार्टी इन लोगो का अलग प्रकार से उपयोग करेगी और सुनिश्चित करेगी की उनका रैंक व् फाइल के अनुसार सम्मान हो।
बैठक से प्राप्त आंकड़ो के अनुसार ये लोग पार्टी नेतृत्व को उन इलाकों सुरक्षित रखने मे नाकाम साबित हो रहे है जहाँ सरकार आक्रामक कार्यवाई कर रही है,इनका फोकस अब उन गाँवों व् शहरों पर है जो माओवादियों द्वारा चलाये जा रहे क्रांतिकारी आंदोलन से अछूते रहे है।

इन क्षेत्रों में ये कदम बीमार वरिष्ठ नेताओं को स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लेने में मदद करेगा और एक गुप्त रणनीति के तहत पार्टी हर 6 महीने में अपने स्थानन्तरित नेताओ से संपर्क किया करेगी ।

यदि पार्टी युवा नेतृत्व के संपर्क में आती तो भले ही राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी कमजोर होती जा रही हो तो हो सकता है कि आने वाले दिनों में माओवादियों का सेना के साथ संघर्ष तीव्र होगा।


Vishal Sharma

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