आध्यात्मिकसंस्कृति

क्या है रामयण के वानरॊं का सच? क्या रामायण के मनुष्य रूपी वानर वंश विलुप्त हॊ गये हैं?

हमने किताबों में पढ़ा है की वानर मनुष्यों के पूर्वज थे। संस्कृत में वानर का अर्थ है वन में रहने वाले मनुष्य। यानी घने जंगलों में रहने वाले बंदर के जैसे दिखने वाले मनुष्यॊं को ही वानर कहा गया होगा। इसका अर्थ है कि रामयण में आनेवाले वानर आधे मनुष्य व आधे बंदर जैसे प्राणी हॊगें। वन कपि और वानर में अंतर हैं। आम तौर पर बंदर को कपि कहते हैं जो वानर से भिन्न है। हनुमान, वाली- सुग्रीव, नल और नील के जीवन को देखा जाये तो वे मनुष्य रूप के बंदर थे और अतिमानुष शक्ति से ऒत प्रॊत थे। वाल्मीकी महर्षी के अनुसार यह प्रजाती भारत के दक्षिण के घने जंगलों में पाये जाते थे।

शिवापिथिकस जिसे रामापिथिकस नाम से भी जाना जाता है यह विलुप्त वानर की एक प्रजाति है। इस प्रजाति के वंश के जीवाश्म अवशेष 19वीं सदी से भारतीय उपमहाद्वीप में सिवालिक पहाड़ियों में पाया गया है। अनुमान है की इस वंशावली में से किसी एक प्रजाति का शायद आधुनिक ऑरंगुटानों के पूर्वज से संबंध हो सकता है। एक और अन्वेषण के अनुसार यह भी अनुमान लगाया जाता है कि रामयण में आनेवाले वानर नियांडरताल मनुष्य  हो सकते हैं जो कि अब विलुप्त हॊ चुके हैं। उन की कष्ठिका अस्थी देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि वे मनुष्य के अति निकटवर्ती प्रजाती होगें जो चल, फिर और बॊल सकते थे।

सिन्धु नागरिकता के उत्खनन के समय नियांडरताल के अस्थीयों को पाया गया है। परंतु इससे यह साबित नहीं किया जा सकता की वे रामायण में आनेवाले वानर ही थे। कुछ अन्वेषक कहते हैं कि रामापिथिकस जो करीब 12-14 मिलियन वर्ष पूर्व में मनुष्य के पूर्वज रहे हॊगें। अनुमान यह भी है कि शिवापिथिकस पुरुष बंदर थे तो रामापिथिकस उसी प्रजाती के स्त्री बंदरियां थीं। उनके जीवाश्मों और अस्थियों से यह अनुमान लगाया गया है कि वे अपना ज्यादा समय पेड़ पे नहीं अपितु धरती पर व्यतीत करते थे। शिवापिथिकस या रामापिथिकस ही रामायण में आनेवाले वानरॊं के पूर्वज थे या नहीं अब तक इस बात का साक्ष्य नहीं मिला है।

कुछ भारतविद नियांडरताल को रामायण में आनेवाले वानरॊं से तुलना करते हैं। उनका कहना है की 5,00,000 वर्ष पूर्व नियांडर ताल की प्रजाती रही होगी जिसका जीवाश्म मानव के जीवश्म से मेल खाता होगा। लेकिन युरॊप के संशॊधनकर्ता इस तथ्य को नकारते हैं क्यॊं कि उनके अनुसार नियांडरताल केवल 7000-10000 वर्ष पुरना प्रजाती है। रामापिथिकस हो या नियांडरताल दोनों ही विलुप्त हो चुकी प्रजाती हैं। आधुनिक मानव -वैज्ञानिक नियांडरताल और रामयण में आनेवाले वानरॊं के देह संरचना में समानता का अभास प्रकट करते हैं। सिवाय पूँछ के बाकी सभी संरचना एक दूसरे से मेल खाते हैं।

रामायण में किष्किंधा कांड में वानरॊं का उल्लेख  है जहां वे गुफाओं में निवास करते थे। कर्नाटक के हंपी में भूमी गत किष्किंधा गुफाओं को देखा जा सकता है। रामयण में जांबवंत का उल्लेख भी आता है जो आधे मनुष्य और आधे भालू के रूप का जानवर था। इस प्रजाती को विश्व के अलग भागों में हिम मानव या येटी नाम से जानते हैं। विष्णु का नरसिंह अवतार भी आधे मानव और आधे सिंह के रूप को दर्शाता है। मत्स्यांगना यानी मरमैड आधी मछली और आधी मनुष्य की तरह दिखती है। रामायण में महर्षी वाल्मीकी वानरॊं का वर्णन करते हुए ‘कपि कुन्जराः’ कहते हैं जिसका अर्थ है हाथी जैसे विशाल काय वाले बंदर। यधपि लाखों वर्ष पूर्व एक विशाल काय वानर प्रजाती रही होगी जो समय के साथ साथ विलुप्त हुई होगी।

राम सेतू के निर्माण में वानरॊं की अहम भूमिका है। राम सेतू मानव निर्मित है इस बात का साक्ष्य हमें मिल चुका है। बहुत लॊग पूछ्ते हैं कि बंदर युद्द कैसे लड़ सकते हैं? बंदर श्री राम लिखना कैसे जानते थे? बंदर बॊल कैसे सकते थे? यधपि वे केवल आम बंदर जिसे आज हम देखते हैं वो न हॊकर एक विशिष्ठ प्रजाती के वानर थे जो मनुष्य की ही तरह चलना, लिखना, बॊलना और युद्दलड़ना जानते थे। रामायण में आनेवाले हनुमान और जांबवंत उस समय के आखरी प्रजाती होंगे जिनका उल्लेख माहाभारत में भी आता है। जांबंवंत के पुत्री से कृष्ण का विवाह का उल्लेख महाभारत में है। संभवत समय के साथ साथ ये प्रजातियां पृथ्वी से ही विलुप्त हॊ गयी और हमारे इतिहास से भी ऒझल हॊ गयी। इतिहास के पन्नॊं को टटोलकर वर्तमान के आविषकारों  से जोड़ेंगे तो शायद हमें सत्य का पता चल जाये….

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Mallstuffs
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