अर्थव्यवस्था

कैसे सोलर पावर भारत के 10 बिलियन डॉलर बचा सकता है, 5% प्रदूषण खत्म कर सकता है और किसानों की आय भी बढ़ा सकता है।

 

माइक्रो ग्रिड उर्जित सौर खेती (सोलर इरीगेशन) से पैदा हुई बिजली को किसानों की स्वामित्व वाली इलेक्ट्रिसिटी कोआपरेटिव में जोड़ने के अभिनव प्रोजेक्ट के बहुत ही उत्साहवर्धक परिणाम मिले हैं जिसकी सहायता से किसानों को बिजली सब्सिडी में खर्च किये जानेवाले भारत सरकार के 10 बिलियन डॉलर को बचाया जा सकता है, भूमिगत जल स्रोत को संरक्षित कर सकते है और भारत के ग्रीन हाउस गैसों के टोटल उत्सर्जन का 5% खत्म किया जा सकता है।

2016 के शुरुआत में दुनिया की सबसे पहली सोलर पंप इरिगेटर्स कोआपरेटिव एंटरप्राइज ने गुजरात के खेड़ा ज़िलें के धुन्दी गांव में काम करना शुरू किया। गुजरात की राजधानी अहमदाबाद के बाहर स्थित “द सोलर पंप इरीगेटर्स कोआपरेटिव एंटरप्राइज (SPICE) ना केवल सोलर ऊर्जा का उपयोग अपने 6 सिंचाई पम्पो को चलाने में करता है, बल्कि जो सरप्लस सौर ऊर्जा है उसे इकट्ठी कर लोकल यूटिलिटी “मध्य गुजरात विद्युत कंपनी(MGVCL) को 25 साल के पावर परचेस अग्रीमेंट के तहत बेचता भी है। 4.63 रूपये प्रति यूनिट सोलर ऊर्जा तथा ग्रीन ऊर्जा के बोनस का रूपये 1.25 प्रति यूनिट और जल संरक्षण के बोनस का 1.25 रूपये प्रति यूनिट से मिला कर करीब करीब रूपये 7.13 प्रति यूनिट की आय होती है। मई 2016 और 2017 के अप्रैल के अंतिम हफ्ते के बीच SPICE ने बिजली बेचकर रूपये 340000 से ज्यादा की कमाई की है।

 

कोआपरेटिव के प्रति वर्ष लगभग 85000किलोवाट घंटा की बिजली उत्पादन की क्षमता के लगभग 53% सरप्लस बिजली को ग्रिड को बेचा जा सकता है जिसका मूल्य करीब 300000 रुपये होता है। सौर ऊर्जा, डीजल से सस्ती पड़ती है और सब्सिडी युक्त ग्रिड बिजली से ज्यादा विश्वशनीय है क्यों कि ये निर्बाध है, निश्चित है और दिन के वक़्त मुफ्त में उपस्थित है। इस के अलावा, बिजली बेचने से जो आय होती है वो गारंटीड आय, किसानों को सूखे, बाढ़, कीटो और रोगों से खेती में होने वाली घाटे से भी उबरने में सहयोग करती है।

खेती योग्य भूमि का समुचित उपयोग हो पाना जो भारत के सर्वाधिक घनत्व वाले क्षेत्रों में एक बड़ी चुनौती होती है, वो यहां पे एकदम नगण्य साबित हुई क्यों की किसान उच्च मूल्य वाले फसल जैसे पालक, गाजर, लहसुन, बीटरूट और कुछ औषधीय पौधों को सोलर पैनल के नीचे की छाया वाली जगहों पर उगाने के प्रयोग में सफल हुए हैं।

सोलर पंप इरिगेटर्स कोआपरेटिव एंटरप्राइज (SPICE) राज्य सरकार और MGVCL को ना केवल किसानों को बिजली पर देने वाली सब्सिडी से मुक्त करता है बल्कि साथ ही साथ ट्रांसमिशन लाइन और केबल, ट्रांसफार्मर इत्यादि पर होने वाले सरकारी खर्चे का भी बचाव करता है। असल मे इस कोआपरेटिव एंटरप्राइज से मिलने वाली बिजली को बेचकर MGVCL पैसा भी कमाता है। MGVCL को लगभग 820,000 रूपये  की इंक्रीमेंटल सालाना आय रिन्यूएबल एनर्जी सर्टिफिकेट्स को बेच कर हो जाती है।

शुरू के छह किसानों ने SPICE में 5000 रूपये प्रति किलोवाट, जो कि पूरे इरीगेशन सिस्टम के खर्च का 8% था, की राशि जमा की थी। सिस्टम लगाने के बाकी के खर्च और माइक्रो ग्रिड के खर्चे को “क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर” अनुदान से पूरा किया गया जो कि क्लाइमेट चेंज, एग्रीकल्चर और खाद्य सुरक्षा (CCAFS) और इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीटूट(IWMI) के CGIAR कार्यक्रम से पूरा हुआ। इस इरिगेशन सिस्टम की प्रारंभिक सफलता से उत्साहित होकर अभी हाल ही में 3 किसानों ने 25000 रुपये प्रति किलोवाट की राशि कोआपरेटिव में सम्मिलित होने के लिए दी है।

इरिगेशन कोआपरेटिव से ग्रामीण माइक्रो ग्रिड का संभावित प्रभाव

“स्पाइस” जैसे अभिनव बिज़नेस मॉडल जो कि “डिस्ट्रिब्यूटेड रिन्यूएबल ऊर्जा” का प्रयोग करके ग्रामीण जीविकोपार्जन को बढ़ा रहे है, ये अभी शुरुआत भर है। टाटा वाटर पालिसी प्रोग्राम-IWMI की रिसर्चर शिल्प वर्मा के अनुसार माइक्रो ग्रिडों की भारत मे अपार संभावनाएं है।

बिजली देने वाली अधिकतर डिस्कोम जो कि घाटे और उधार में डूबी है वो अक्सर ग्रामीण क्षेत्रो के दूर दूर स्थापित प्रोजेक्ट्स को करने में हिचकिचाती हैं क्यों कि इनमे खर्च बहुत आता है, साथ ही साथ मीटरिंग की समस्या भी होती है लेकिन इस तरह के कोआपरेटिव इरिगेशन सिस्टम से, एक ही स्थान पर बिजली की मीटरिंग हो जाती है अतः ये डिस्कोम कंपनियों के लिए भी उत्साहवर्धक और फायदेमंद है। बाकी हर किसान के उपयोग के आधार पर कोआपरेटिव किसानों से बिजली मूल्य की वसूली करता है।

भारत मे करीब करीब 15 मिलियन सिंचाई के पम्प ग्रिड से जुड़े है। जिससे करीब करीब 700 बिलियन रुपये की सब्सिडी का खर्च है। “स्पाइस” मॉडल इस भारी भरकम खर्च को खत्म कर सकता है साथ ही साथ इन इरिगेशन सिस्टम से जुड़े लोगों को जल संरक्षण और सौर ऊर्जा के उपयोग के लिए प्रोत्साहित भी करता है। बिजली पर अभी दिए जाने वाले सब्सिडी से किसान जल संरक्षण और बिजली बचत के प्रति उदासीन रहते है।

सामान्य ग्रिड से मिलने वाली ऊर्जा के उपयोग और भूमिगत जल से सिंचाई के लिए डीजल का प्रयोग करने से लगभग 260 लाख टन कार्बन उत्सर्जन होता है जो कि पूरे भारत के कार्बन उत्सर्जन का 5% है। इस अभिनव प्रयोग में सोलर ऊर्जा के प्रयोग से ये कार्बन उत्सर्जन घटाया जा सकता है।

इस प्रयोग का सबसे अच्छा लाभ छोटे किसानों को मिलता है। एक 7.5 किलोवाट क्षमता वाले सोलर पंप से एक हेक्टेयर खेती योग्य भूमि की सिंचाई की जरूरत तो पूरी होती ही है साथ ही साथ 60,000 रुपये (7 रुपये प्रति किलोवाट घंटे के हिसाब से) प्रतिवर्ष की अतिरिक्त कमाई भी हो जाती है जो कि छोटे किसानो के लिए बड़ी पूंजी होती है। इससे किसानो की आय दुगुनी करने के मोदी जी के प्रयासो में एक छोटा सा कदम मानकर देखा जा सकता है।


विवेक गुप्ता

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