अभिमतराजनीति

एक पत्र जिग्नेश मेवानी के नाम

जिग्नेश मेवानी,

आपने और हमने हमेशा यही पढ़ा और सुना है कि “सफलता आपके कदम चूमेगी” या “सफलता आपके कदमों में होगी” इसका मतलब ये है कि सफलता कितनी भी बड़ी हो जाय उसका स्थान आपके कदमों में ही होना चाहिए और हमने ये भी पढ़ा और सुना है कि “सफलता का नशा सिर चढ़कर बोल रहा है” इसका मतलब ये है कि नशा सिर पर चढ़कर बोलता है और नशे में आदमी ऊटपटांग बोलता है, जो मन में आये बक देता है सामने कौन है इसका लिहाज़ नहीं करता है।

महज 24 घंटे ही बीते थे और आपने जिस तरह की भाषा का प्रयोग न सिर्फ प्रधानमंत्री बल्कि अपने पिता की उम्र के एक व्यक्ति के लिए किया उससे आपका असली चाल चरित्र तो उजागर हो ही गया और आपकी भाषा पर आपके दोनों साथियों का भी जिन्होंने अट्टहास लगाकर उसका समर्थन कर दिया।

जिग्नेश मेवानी आपकी भाषा में आत्मविश्वास तो बिल्कुल नहीं था लेकिन घमंड, अहंकार कूट कूटकर भरा था।

आपके अनुसार – “मोदी जी दिमाग से बूढ़े हो गए हैं, उनको अपनी हड्डियाँ गलाने के लिए हिमालय चले जाना चाहिए, अब राजनीति हम युवा करेंगे, मोदी जी को घर बैठ जाना चाहिए”

आपकी भाषा से लगा कि शायद ऐसे ही आप अपने पिता से,चाचा से, बड़ों से बात करते होंगे क्योंकि कोई इंसान कितना भी प्रसिद्ध या पैसे वाला बन जाय, उसके मुँह खोलते से ही उसकी परवरिश का पता चल जाता है और कल न सिर्फ गुजरात बल्कि देश को आपकी परवरिश का अंदाज़ा हो गया है।

जिस राजनीति को आपने अपना करियर चुना है और जिसने आपको शुरुआती सफलता दे दी है उसको अभी आपने सुईं की नोंक बराबर भी जाना नहीं है। दुनिया का नहीं पता लेकिन भारत की राजनीति बेहद क्रूर, निर्मम और आपकी सोचने समझने की शक्ति की हद के बाहर छल कपट, द्वेष, ईर्ष्या से भरी होती है। कंधे पर रखा विश्वास भरा हाथ कब पीठ में छुरा घोंप देगा इसका अंदाज़ा राजनीति में अपनी पूरी उम्र गुज़ार चुके लोगों तक को नहीं होता है। फिर आप जिस कांग्रेस पार्टी के साथ खड़े हो उसका तो इतिहास ही यही रहा है उसने गले का हार बनकर गले काटे हैं, पैरों की जूती बनकर काँटे चुभोये हैं, सिर का ताज बनाकर गटर में फेंका है, पहाड़ पर चढ़ाकर धक्का दिया है, पीठ पर हाथ फेरते फेरते पीठ में छुरे घोंपे हैं। वक़्त आपको ये सब अनुभव कराएगा क्योंकि ज़्यादा बड़े बोल नियति को पसंद नहीं आते हैं।

अब रही बात प्रधानमंत्री की बूढ़ी हड्डियों की तो जिग्नेश मेवानी इसी मोदी के साथ खुद हिमालय जाना और देखना किसकी हड्डियाँ सबसे पहले गलना शुरू होती हैं, ज़्यादा नहीं सिर्फ एक हफ्ता मोदी जी के साथ रहकर उनकी दिनचर्या के हिसाब से सुबह उठना, योग करना, तय समय पर ऑफिस जाना, दिन भर मोदी जी जहाँ जहाँ जाएँ,वहाँ वहाँ उनके साथ जाना, जो खाएँ पियें वही खाना पीना, एक सिर्फ एक हफ्ते के लिए ये करके दिखा दो जिग्नेश मेवानी उसके बाद अपने युवा (?) होने और दिलचस्प (?) होने का नशा हिरण न हो जाय तो कहना।

जिस हिमालय में मोदी को जाने का कह रहे हो उसी हिमालय की गोद से ही ये आदमी आया है और उसके तप का धूल बराबर भी अपनी पूरी ज़िंदगी में तुम हासिल नहीं कर पाओगे क्योंकि शुरुआत के साथ ही तुमने अपने अंत की कहानी भी लिख दी है।

66 वर्ष की उम्र में जो जोश, जो जज़्बा, जो उत्साह इस आदमी में है उसकी होड़ दुनिया के बड़े से बड़े नेता नहीं कर पा रहे हैं। ये वो है जो बराक ओबामा को सिर्फ बराक बोलता है, जो जापान के प्रधानमंत्री को गंगा आरती में तीन घंटे बिठाता है जो चीन के राष्ट्रपति को ओटले पर बिठाता है और झूले में झुलाता है, पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर मारता है, पूरे देश को लाइन में लगाता है उसके बावजूद एक के बाद एक राज्यों में अपनी पार्टी की विजय पताका फहराता है। आपकी 125 साल पुरानी पार्टी के इतिहास में किसी ने ऐसा करना तो दूर ऐसा करने की सोची भी नहीं होगी और उसी 125 साल पुरानी पार्टी को आज दर दर को ठोंकरे खाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

मोदी ये सब इसलिए कर पाते हैं क्योंकि उनकी न सिर्फ हड्डियाँ बल्कि इरादे भी फौलाद के हैं, उनकी नीयत साफ है इसीलिए तमाम तकलीफों के बावजूद देश की जनता उनके साथ खड़ी होती है।

आपने तो एक सीट ही जीती है तो ये हाल हैं, ज़रा याद करो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को, अन्ना आंदोलन के बाद लोकसभा चुनावों में उन्हें 100 सीटें जीतने का गुमान हो गया था लेकिन देश की जनता ने ज़मानत जप्ती का विश्व रिकॉर्ड बनवा दिया। फिर दिल्ली विधानसभा में पहले 28 फिर 67 सीटें जीतने के बाद इस आदमी के सिर पर भी सफलता का नशा सिर चढ़कर बोल रहा था, पैर ज़मीन पर टिकने को तैयार ही नहीं थे। आये दिन सुबह से लेकर रात तक निशाने पर सिर्फ और सिर्फ मोदी, लेकिन हुआ क्या, पहले पंजाब, गोवा फिर दिल्ली एमसीडी चुनावों में जनता ने हवा में उड़ रहे केजरीवाल को दुबारा ज़मीन पर ला पटका उसके बाद से अपने आपको तीस मार खाँ समझने वाला ये आदमी आज है कहाँ ये भी ढूँढना पड़ता है।

इसे गुजरात की जनता का सौभाग्य ही कहना चाहिए कि वो जातिवाद का ज़हर लिए हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकुर, आप तीनों नेताओं और देश की सबसे धोखेबाज़ पार्टी के साथ मिलकर गुजरात को अराजकता, अशांति, आपसी दुश्मनी की आग में झुलसने से बच गए।

सफलता अगर आपके माथे पर चढ़ने की बजाय आपके कदमों में होती है तो वो आपको नम्र बनाती है सम्मान दिलाती है इसका सबसे बड़ा उदाहरण है – सचिन तेंदुलकर, सिर्फ 16 साल की कच्ची उम्र से लेकर , 40 साल की उम्र में क्रिकेट से सन्यास  लेने तक उन्होंने कभी अपनी बेपनाह सफलता, शौहरत और दौलत पर घमंड नहीं किया। विश्व के कई गेंदबाज़ों ने सचिन को लेकर बयान दिए और सचिन ने हर बार उनको जवाब सिर्फ अपने बल्ले से ही दिया। कभी कोई बड़बोलापन नहीं, कभी घमंड नहीं, कभी जलन नहीं यही वजह है कि पूरी दुनिया सचिन के खेल के अलावा उनके इस सौम्य, नम्र, ज़मीन पर रहने के कारण उनका बेहद सम्मान और प्रेम करती है और सदियों तक करती रहेगी।

पार्टी तो अभी शुरू हुई है हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश आगे आगे देखो होता है क्या?

एक अदना सा राष्ट्रभक्त
हर्षल खैरनार

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