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मि लार्ड, 30 साल से कश्मीरी पंडितों की गुहार सुनने के लिए समय नहीं, ‘प्रार्थना में हिन्दू’ पद्दती के केस के लिए समय है।

मि लार्ड 1989-90 में इस देश में एक नर संहार हुआ था जिसमें हज़ारॊं कश्मीरी पंडितों के ऊपर कहर बरसा था| वो कश्मीरी पंडित तीस साल से अपने ही देश में निर्वासितों की तरह जीवन जी रहे हैं। 215 केस जिनको एक बार फिर खोलकर CBI को सौंपने और इस नरसंहार के रचैता यासिन मलिक के ऊपर केस दायर करने के लिए PIL दायर किया गया था। लेकिन मि लार्ड ने इस PIL को खारिज कर दिया यह कहते हुए की 27 साल पहले घटी घटना के लिए साक्ष्य नहीं मिल सकता! मि लार्ड, जो बचे कुचे कश्मीरी पंडित देश में निर्वासितों की तरह जीवन बिता रहे हैं वो स्वयं इस नरसंहार का जीता जागता साक्ष्य है।

मि लार्ड, 2016 के आंकड़ों के अनुसार देश भर के ज़िला कोर्ट में 2.8 करोड़ केस विचाराधीन है। करीब 5000 जजों की नियुक्ती करनी बाकी है जिससे इन केसों को जल्द से जल्द निपटाया जा सके। मान्य सर्वोच्च न्यायालय में 2016 तक कुल 48,418 सिविल और 11,050 क्रिमिनल केस लटके हुए हैं। इनमें से 1,132 सिविल और 84 क्रिमिनल केस पिछले दस साल से लटके हुए हैं। 2016 में केवल 6,054 केस को निपटाया गया है जबकि 2015 में 47,424 केस निपटाये गये थे। साल दर साल केस को निपटाने की तेज़ी में गिरावट आ रही और केसों की संख्या में बड़ोत्तरी आ गयी है।

अब उच्च न्यायालय के आंकड़ों की बात करे तो 2014 तक 31,16,492 सिविल और 10,37,465 क्रिमिनल केस न्यायालय के दरवाज़े पर गुहार लगा रहे हैं। इनमें से पिछले दस साल से लटके हुए 5,89,631 सिविल केस और 1,87,999 क्रिमिनल केस हैं। 2016 में सर्वॊच्च न्यायलय में कुल 59,468 केस और 2015 तक उच्च न्यायालय में 40,05,704 केस विचाराधीन हैं। अब तो साल बीत चुका है तो सहज ही इन आंकड़ों में और कुछ केस भी जुड़ ही गये होगें।

कुछ केस तो पिछले दस साल से कोर्ट कचहरी के दरवाज़े खटखटा रहे हैं। लोगों को तारीख पे तारीक मिलते रहें मि लार्ड पर न्याय नहीं मिला। कोर्ट के चक्कर काटते काटते कुछ लोगों की चप्पलें घिस गयी, कुछ लोगों की एड़ियाँ रगड़ गयी और तो और, कुछ लोग तो निर्णय आने से पहले ही परलोक सिधार गये लेकिन उनको इन्साफ नहीं मिला जनाब। आपके पास समय की कमी होगी और देश भर में कम से कम 10,000 जजों की कमी भी होगी जनाब।

हमको तो बचपन से सिखाया गया है कि भारत धर्म निरपेक्ष देश है और हमको यह भी सिखाया गया है कि भगवान से हाथ जोड़कर  आँख बंद करके प्रार्थना की जाती है। सभी धर्म में लगभग इसी तरह से प्रार्थना की जाती है। अब इस प्रार्थना के विधी में भी किसी को सांप्रादायिकता दिखी बहुत खेद की बात है जनाब। हिन्दू बच्चे इसाइयों के कान्वेंट में पढ़ते हैं जहां उन्हे तिलक-बिंदी, हाथों  में चुडीयाँ और बालों में गजरे पहनने नहीं दिए जाते। कहते हैं इससे बच्चों में एकता की भावना आती है। कोई हिन्दु इस पर आपत्ति नहीं करता और कहता है कि ‘हिन्दुत्व’ खतरे में हैं।

हिन्दुओं के स्कूल में मुस्लिम बच्चियां बुर्खा पहनकर आती है तो कॊई हिन्दू आपत्ति नहीं जताता क्यों कि वो उनका धर्म का पालन कर रहे हैं। कोई हिन्दू न्यायालय में यह कहते हुए गुहार नहीं लगाता की ईसाई स्कूल में हिन्दु पद्दतियों का अवमान हो रहा है, कॊई हिन्दू बुर्खे पर बैन लगाने की बात नहीं करता। हिन्दुओं को धर्म निरपेक्षता खतरे में नहीं दिखती लेकिन बड़े अंचंबे की बात है कि केंन्द्रीय विद्यालय में मात्र हाथ जोड़कर आँख बंद कर प्रार्थना करने से देश की धर्म निरपेक्षता खतरे में आ जाती है। और उससे भी अंचबित करने वाली बात है की करोड़ों केस जो वर्शों से न्यायालय में लटके हुए हैं उनके लिए मि लार्ड के पास समय नहीं लेकिन बाकी केस के लिए हैं!

स्कूलों में बच्चों को पढ़ाया जाता है कि भगवान एक ही है केवल नाम अलग है। बच्चे एक सुर में ईश्वर-अल्ला तेरो नाम गाते हैं इसमें किसी को आपत्ति नहीं होती, गौ हत्या करते समय देश में सांप्रदायिकता नज़र नहीं आती। लेकिन प्रार्थना करते समय आँख बंद करके हाथ जोड़ने से और गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने से सांप्रादायिकता आ जाती है! पिछले कुछ वर्षों से न्यायालय के आंगन से भ्रष्टाचार के कई मामलें उछल उछल के आ रहे हैं। जजों की नियुक्ती में पक्षपात, रिश्वत खोरी जैसे मामले सामने आयें है। देश के न्यायपालिका में कॊलिजियम व्यवस्ता को हटाकर पारदर्शिता लाने की मांग जगह जगह से उठ रही है। लेकिन मि लार्ड व्यस्त हैं उनके सामने रोहिंग्या, मंदिर में घंटी, स्कूल में हिन्दु विधी से प्रार्थना, पटाकों पर प्रतिबंध लगाना, ऐसे बहुत ज़रूरी केस हैं तो पहले वो उनको निपटालेंगे और दूसरों के लिए तारीख दे देंगे चिंता करने की कॊई बात नहीं।

कानून सबके लिए एक बराबर होना चाहिए। अगर संविधान की दुहाई, धर्म निरपेक्षता की आड़ में एक समुदाय के हित से जुड़े निर्णय लेते हुए दूसरे धर्म के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाया जाता रहेगा तो वह संविधान का ही अपमान होगा। ऐसा करने से न्यायापलिका का भी अपमान होगा क्यों कि आज भी देश की जनता न्याय के लिए न्यायपालिका का दरवाजा खट खटाती है। धीरे धीरे जनता न्यायापालिका और अदालतों पर अपना विश्वास खो रही है। लोगों को ऐसा प्रतीत होने लगा है कि हिन्दुओं की मान्यताओं को बेवजह कटघरे में खड़ा कर उनके ऊपर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। हिन्दुओं की भावनाओं को बार बार आहत किया जा रहा है। इस देश में हिन्दुओं के हित के बारे में बात करना अपराध है। अब हिन्दु न्याय मांगने कहां जायेगा मि लार्ड……

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