राजनीति

क्यों करती थी सॊनिया गांधी ‘जनता के राष्ट्रपति’, भारत रत्न डॉ अब्दुल कलाम से नफरत?

तीन बार कलाम के राष्ट्रपति बनने के मार्ग में रोड़ा बन कर क्यों खड़ी थी मैडम जी?

देश जिनको केवल प्यार ही नहीं अपितु जिनकी पूजा भी करता है, वो हैं हमारे प्यारे अब्दुल कलाम। भारत के महामहिम, जनता के राष्ट्रपति, इतिहास में पहली बार जिन्होंने राष्ट्रपति भवन के दरवाज़े आम जनता के लिए खॊल दिये थे, जो भवन के चार दीवार से निकल कर जनता के बीच जाकर काम करते थे, जिनसे सारा देश एक मत से आज भी प्यार करता है उस महानुभाव अजातशत्रु अब्दुल कलाम से नफरत करती थी मैडम जी।

देश ने कई राष्ट्रपति देखें हैं लेकिन डॉ कलाम जैसा नहीं देखा। कभी हमें लगा ही नहीं कि वे देश के राष्ट्रपति हैं, अपितु हमें हमेशा यही लगा कि वे हमारे आप्त बंधू हैं। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया। आपत्तीजनक टीका-टिप्प्पाणियां नहीं की। सबसे प्यार किया, सबको एक समान रखा। चाहे डीआरडीओ में निदेशक का काम करते हुए हो, या देश के महामहिम बने कार्यकाल में हो उन्होंने कभी घमंड नहीं किया, सत्ता का मद उनके सर चड़ कर नहीं नाचा। मरते दम तक काम करने वाले कर्मठ व्यक्ति, ता उम्र सीधा साधा जीवन व्यतीत करनेवाला व्यक्ति, जिसने संपत्ति के नाम पर केवल और केवल जनता का प्रेम कमाया हो उस व्यक्ति से मैडम जी को नफरत थी।

हां नफरत ही थी, अगर नहीं होती तो मैडम जी ने दूसरी बार अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनने से क्यों रॊका? जब सारे पक्ष और देश की जनता अब्दुल कलाम को दुबारा राष्ट्रपति के रुप में देखना चाहती थी तो मैडम ने आपत्ति क्यों जतायी। तीसरी बार भी जब कलाम को राष्ट्रपति बनाने की मांग उठी तब भी उस मांग को क्यों खारिज कर दिया गया? कांग्रेस में वही होता है जो मैडम जी चाहती है। देश की आवाज, विपक्ष की या फिर अपने ही पार्टी की मांग उससे मैडम जी को कॊई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें तो सिर्फ अपने पालतू चाहिए जो उनकी हाँ में हामी भर सके। इसीलिए अब्दुल कलाम के जगह पर उन्होंने प्रतिभा पाटिल को खड़ा कर दिया और राष्ट्रपति पद की गरिमा को मिट्टी में मिला दिया।

जिस देश ने अटल जी और अब्दुल कलाम जैसे महामहिम को देखा था उस देश को एक ‘रब्बर स्टेंप राष्ट्रपति’ और ‘रॊबोट प्रधानमंत्री’ को देखना पड़ा। केवल मैडम जी की ज़िद के वजह से। मैडम जी 1995 से ही प्रधानमंत्री बनना चाहती थी लेकिन कई कारणॊं के चलते वे बन नहीं पाई। उसके बाद मैडम जी ने हर वह काम किया जिससे उनकी पीएम बनने की रास्ते के सभी रोड़े हट जाये। 2004 में यूपीए  की कुर्सी पर बैठ कर राज करने ही वाली थी कि ऐन वक्त में स्वामी जी ने उनके इटली के नागरिक होने का बम फौड़ा खुद को प्रधानमंत्री बनाकर ही दम लेने वाली थी।

सॊनिया का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय था। राष्ट्रपति भवन में सॊनिया के प्रधानमंत्री बनने की सारे प्रकिया पूरी भी हो चुकी थी। एक दिन अब्दुल कलाम जी से सॊनिया मुलाकात करने जाती है और उसके कुछ ही क्षण बाद सॊनिया पीएम पद से अपनी दावेदारी हटा देती है। अचानक उनकी ‘अंतरात्मा’ जाग उठती है और वह देश के लिए प्रधानमंत्री कुर्सी को ‘त्याग’ देती है! आखिर क्या बात हुई थी कलाम और सॊनिया के बीच? क्या उस ‘बातचीत’, जिसके कारण उन्हें कुर्सी त्याग ना पड़ा  उसी रंजिश के चलते ही मैडम जी ने अब्दुल कलाम के जगह पर प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी को ज्यादा यॊग्य समझा?

वास्तव में यह पहली बार नहीं था जब मैडम जी ने कलाम के नाम पर असहमति जतायी थी, बल्कि  2002 से ही वह कलाम के राष्ट्रपति बनने को लेकर असहनशील थी। सॊनिया की पहली पसंद के.आर. नारायणन थे और वह उन्हें ही दूसरी बार राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहती थी जब के सारी पार्टियां कलाम के नाम पर मुहर लगा चुकी थी। The decision-making in the Congress, too, went into a tailspin, after it dawned on its leaders that Mr. Narayanan would not be willing to contest against Dr. Kalam, even if the Opposition remained united. The party president, Sonia Gandhi, twice called informal meetings of the Congress Working Committee; the CWC met once in the morning but the evening meeting was “postponed.” And, in between, she had a visit from the senior CPI (M) leader, Harkishan Singh Surjeet. After the first CWC meeting, the party spokesperson, Jaipal Reddy, told newspersons that “Mr. Narayanan is still the party’s candidate. Our request is still pending.” जब मैडम जी की मनमानी नहीं चली तो उन्होंने CPI (M) के साथ मिलकर कलाम के विरुद्द लक्ष्मी सहगल को खड़ा करदिया। उनके प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में कॊई बाधा ना आये इसलिए मैडम जी को हर हाल में कलाम को रास्ते से हटाना था।

कलाम ने सॊनिया के प्रधानमंत्री ना बनने के विषय में अपने किताब में लिखा है कि जब सॊनिया जी मनमोहन सिंह जी को प्रधानमंत्री उम्मीद्वार बनाकर लायी, तो वे आश्चर्य चकित हुए थे क्योंकि राष्ट्रपति भवन के कार्यदर्शियों को ‘पहले ही लिखे गये पत्र’ को अब बदलना पड़ रहा है। कलाम यह भी कहते हैं कि अगर विरॊध के चलते भी सॊनिया प्रधानमंत्री बनने का फैसला लेती तो उनको वह स्वीकार ना ही पड़ता। Turning Points: A Journey Through Challenges किताब में कलाम ने इन सारी बातों को लिखा है। “That is when she told me that she would like to nominate Dr. Manmohan Singh, who was the architect of economic reforms in 1991 and a trusted lieutenant of the Congress party with an impeccable image, as the Prime Minister. This was definitely a surprise to me and the Rashtrapati Bhavan Secretariat had to rework the letter appointing Dr. Manmohan Singh as the Prime Minister and inviting him to form the government at the earliest.”

“During this time there were many political leaders who came to meet me to request me not to succumb to any pressure and appoint Mrs Gandhi as the Prime Minister, a request that would not have been constitutionally tenable. If she had made any claim for herself I would have had no option but to appoint her”. भले ही डॉ कलाम ने रहस्य से परदा ना उठाया हो लेकिन सच यह भी है की जो महिला 1995 से ही प्रधानमंत्री बनने की पृष्ठभूमि तयार करती रही उसने एका एक उस कुर्सी को ‘त्याग’ कैसे दिया? हालांकि हम सभी जानते हैं की 2004-2014 तक दस साल ‘कुर्सी’ पर कौन बैठा और ‘किसने’ सत्ता संभाली।

कुछ लोगों का कहना है कि राहुल और प्रियांका ने आपत्ति जताई थी कि उनकी माँ अगर प्रधानमंत्री बनेंगी तो दादी और पिता की ही तरह सॊनिया जी को भी खो देना पड़ेगा। जैसा देश ने देखा है राजीव गांधी के बाद उस परिवार के किसी भी सदस्य का बाल भी बाँका नहीं हुआ है! अगर यह सच है की प्रधानमंत्री कुर्सी पर बैठने से उनकी हत्या होती है तो क्या अब मैडम जी को अपने बेटे को खो देने का डर नहीं लगता? क्योंकि कांग्रेस के ऒर से प्रधानमंत्री बनने के एक ही दावेदार हैं और वो केवल राहुल गांधी है। तो क्या राहुल गांधी को अब डर नही लगता खुद को प्रधानमंत्री का दावेदार बनाते हुए? सच्चाई कुछ और ही है जो केवल कलाम, मैडम जी और सिंह साब ही जानते हैं। अपने पूरे जीवन काल में कलाम ने कॊई विवादात्मक बयान नहीं दिया था तो सहज ही है कि वे इस रहस्य से कभी परदा नहीं उठाते कि मैडम जी ने कुर्सी क्यों छोड़ी और सिंह साब तो अपने जीवित काल में कभी मुहुं खोलेंगे नहीं तो यह रहस्य ही रह जायेगा कि डॉ कलाम और मैडम जी के बीच क्या बात हुई थी।

बिना किसी ठॊस कारण के मैडम जी कलाम के राष्ट्रपति बनने के रास्ते में तीन बार रोड़ा नहीं लगाती। पहली बार मैडम जी सफल नहीं हुई थी लेकिन बाद में दोनों बार भी उन्होंने कलाम को दुबारा राष्ट्रपति बनने से रोक दिया। जब देश कलाम को दूसरी बार राष्ट्रपति के पद पर देखना चाहता था  तो मैडम जी ने जनता की आवाज़ क्यों नहीं सुनी? देश को कलाम जैसे राष्ट्रपति कभी नहीं मिलेंगे यह जानते हुए भी मैडम जी ने कलाम के नाम पर मुहर क्यों नहीं लगायी। देश ने कलाम की न जाति देखी, न रंग देखा, न प्रांत देखा, न उनकी भाषा देखा। देश ने कलाम में भगवान देखा, उनके हृदय में देश के लिये भरा प्रेम देखा, उनकी मानवता भरे व्यक्तित्व को देखा। लेकिन मैडम जी ने सिर्फ़ अपना स्वार्थ देखा, नफरत की आग में देश को एक अच्छे राष्ट्रपति को दुबारा देखने की अवकाश से वंचित रखा।

देश ‘मिसाइल मैन’, ‘जनता के राष्ट्रपति’ हमारे प्यारे भारत रत्न डॉ अब्दुल कलाम को भावभीनी श्रद्धांजली देता है और उनकी चरण वंदना करते हुए उन्हें याद करता है… कलाम आपको देश का सलाम…

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