आध्यात्मिकसंस्कृति

जौनपुर का जामा मस्जिद जो कभी अटला देवी का मंदिर हुआ करता था उसे इब्राहिम नायीब बारबक ने तोड़ दिया था।

देश में कई मंदिर और बौद्ध स्थूप है जिसे तोड़कर मस्जिद और मकबरें बनाई गयी है। लगभग हर मस्जिद के कब्र के नीचे हिन्दू देवी देवताओं के मंदिर के अस्तित्व पाए गाये हैं। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? हिन्दुओं का मंदिर है उसे तोड़ने से किसी को कॊई फर्क नहीं पड़ता। हाँ अगर मुसल्मानों की कब्र पर खरॊच भी आई ना तो खबरदार, भारत की ‘सेक्यूलरिस्म’ खतरे में आ जायेगी। यहां हिन्दु हित के बारे में बात करना मना है। जानते नहीं कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमॊहन सिंह जी ने क्या कहा था? इतनी जल्दी भूल गये कि उन्हेंने कहा था कि इस देश के संपत्ति में पहला हक मुसल्मानों का है!

अरब से आये इस्लाम के आतंकियों ने देश का हर एक मंदिर तोड़ कर उसे मस्जिद बना दिया है। मंदिरों में लूट पाट मचाया है अपनी मतांधता का साक्ष्य देते हुए उन्होंने देवी देवताओं के मुर्तियों को विक्षत किया है। ऐसा ही एक मंदिर था जौन पुर का अटला देवी मंदिर। इस्लामी लुटेरा फिरॊज़ शाह तुघलक-3 का भाई इब्राहिम नायीब बारबक के बर्बरता के चलते यह मंदिर धराशाही हो गया। लोग इस मस्जिद को अटला मस्जिद के नाम से जानते हैं। यह मस्जिद जौनपुर में स्तिथ है। 1364 CE में इब्राहिम ने इस मंदिर को तोड़ कर 1377 CE में मस्जिद का निर्माण कार्य शुरू किया था।

कन्नौज के राजा विजयचंद्र ने अटला देवी का मंदिर बनावाया था। अटला देवी यानी भाग्य को बदलनेवाली देवी जिसके शरण में आते ही आपके भाग्य के ताले खुल जाते थे। माना जाता है कि कठोर से कठॊरतम भाग्य भी देवी के शरण में आते ही बदल जाते थे और व्यक्ति  की किस्मत चमक जाती थी। इब्राहिम ने इस मंदिर के जगह पर अजमली नामक संत के सम्मान में मस्जिद बनवाया। मंदिर के स्तम्भों पर अनेक तिथियां लिखी हुई है, जो इस बात का साक्ष्य है कि मंदिर को तोड़ कर ही मस्जिद को बनवाया गया था।

मस्जिद के तीनों ओर बनीं महराबदार छतें और उनके बीच में स्थित 174 वर्ग फीट का अहाता मंदिर का ही था। एच.आर. नेविल ने इस सम्बंध में पुरातत्व के विख्यात ज्ञाता जनरल कनिंघम का उदाहरण दिया है। मंदिर के स्थान पर बनाई गई एक और मस्जिद है ‘चार अंगुली मस्जिद’। उसके मुख्य द्वार के बाईं ओर एक पत्थर है जो किसी हाथ की चार अंगुलियों में सठीक बैठता है, चाहे अंगुलियां बच्चे की हों या वयस्क की। यह माना जाता है कि चरु ऐसा चमत्कारिक मंदिर था जिससे इच्छाओं की पूर्ति हो सकती थी और श्राप भी सच हो जाते थे। वहां मूल पत्थर को निकाल कर उसके स्थान पर दूसरा पत्थर लगाया गया है।

इब्राहीम नाइब बारबक के अधीन जौनपुर के सूबेदार क्रमश: मुखलिस और खालिस रहे। इस मस्जिद का निर्माण इब्राहीम ने विख्यात संत शिराज के सैयद उस्मान की सुविधा के लिए करवाया था जो तैमूर के आक्रमण के बाद दिल्ली से भाग आया था। 1908 में जब एच.आर. नेविल ने गजेटियर प्रकाशित किया, उस समय भी उस संत के वंशज उस मस्जिद के पास रहते थे। मस्जिद की छत मंदिर के दस स्तम्भों की कतारों पर ही बनी है।

नेविल जौनपुर का कलक्टर था और उसने अपने गजेटियर में लिखा है कि-“अपेक्षाकृत अधिक उल्लेखनीय भवनों की विशेषता यह थी कि उसका अधिकतर निर्माण पुराने हिन्दू मंदिरों और महलों की सामग्री से किया गया था। विध्वंस का काम इतनी पूर्णता से किया गया कि पूर्व काल के अवशेषों का कोई भी चिन्ह देखने को नहीं मिलता, लेकिन यह स्पष्ट है कि जौनपुर, विशेषकर कन्नौज के हिन्दू शासकों के काल में, आकार में एक बड़ा स्थान रहा होगा।’ साक्ष्य हमारे सामने हैं किन्तु हम असहाय है। भारत के हज़ारों मंदिरों को बर्बरता से तोड़ा गया है और देव-देवियों की मूर्तियों को क्षत विक्षत किया गया है।

भारत का हर मस्जिद, हर कब्र हमसे कुछ कहता है उसके नीचे दबा हुआ हमारे मंदिर हमसे न्याय मांगता है लेकिन हम बहरे ही नहीं अंधे भी हैं। इस देश में हिन्दुओं के विरुद्द उनकी सभ्यता और मान्याताओं के विरुद्ध कॊई कुछ भी बॊल सकता है किन्तु एक हिन्दू अपने हक के लिए आवाज़ भी नहीं उठा सकता है। अपने ही देश में निर्वासितों की जीवन जी रहे हैं हिन्दु। हिन्दुओं में एकता की कमी के चलते हुए ही यह हुआ है। राजनैतिक पार्टिया कभी हिन्दुओं को एक हॊने नहीं देगी और हिन्दु आपस में ही लड़ के मरते रहेंगे यही हमारा भाग्य है। यधपि अटला देवी ही इस भाग्य को बदल दे यही प्रार्थना है कि देश के हिन्दू एक जुट हॊ जाए।

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