संस्कृति

‘विजयनगर’ ,भारत का महान साम्राज्य जहां सड़कों पर हीरे- मोती- जवाहरात बिकते थे जिसे सुल्तानों ने जलाकर खंडहर बना दिया।

कर्नाटक के ‘विजय नगर साम्राज्य’ के बारे में तो सबने सुना होगा। साम्राट श्री कृष्ण्देवराय और तेनालीरामा के बारे में तो बचपन से ही हमें पढ़ाया गया है। जब देश-विदेश के साम्राज्य अपने बाज़ारों में चूरन- सब्ज़ी बेचते थे तब विजय नगर साम्राज्य अपने बाज़ारों में हीरे-मॊती-जवाहारात बेचता था! कभी सुना है ऐसे साम्राज्य के बारे में जहां हीरे मोती कौड़ी के दाम सड़कों पर मिलता था। भारत का गौरव है विजय नगर साम्राज्य। भारतमाता की शीष की मुकटमणी है विजय नगर साम्राज्य।

‘विजय नगर’ दिल्ली के सुल्तानों को टक्कर देते हुआ बनाया गया भारत का अंतिम हिन्दू साम्राज्य था। 1346 C.E में विजय नगर साम्राज्य की स्थापना दखन प्रस्थभूमी में हिन्दू धर्म को मुघल आतातायियों से बचाकर रखने के लिए की गयी थी। हरि हरा( हक्का) और बुक्का नामक दो वीराग्रणी भाइयॊं ने विजय नगर साम्राज्य की नींव 1303 में रखी थी। 1357-1377 तक इनका साम्राज्य पूरे द्खन प्रस्थभूमी पर फैल गया था। कृष्णा नदी से लेकर रामेश्वरम तक और तमिल प्रांत से लेकर चेरा( केरल) तक विजय नगर साम्राज्य फैला हुआ था। बहमनी सुल्तानों के साथ विजय नगर साम्राज्य का युद्ध होता रहता था और बहमनी सुल्तान हमेशा युद्द में हार जाते थे।

VIJAYANAGAR Empire in India. Extent of Vijayanagar Empire. Battle of Talikot.

हक्का-बुक्का के कालानंतर हरिहरा 2 और देवराय 1 अपने पूर्वजों की गरिमा को बनाए रखा और अपने साम्राज्य का विस्तार करते गये। इन दोनों राजाओं ने भी अपने पराक्रम से बहमनी सुल्तानों को अपने कदमों तले दबाए रखा था। ओड़िसा के गजपतियों के साथ भी लगातार युद्द करने के कारण मुस्लिम कट्टर पंथी सुल्तानों से लड़ने में उन दोनों को कठिनाई का सामना करना पड़ता था। विजय नगर की समृद्धी का सूरज कीर्ती के आकाश में तब चमका जब उसका कमान श्री कृष्णदेवराय (1509-29) ने संभाला।

जैसे महाभारत के कृष्ण के काल में द्वारका स्वर्ण नगरी कही जाती थी ठीक वैसे ही श्री कृष्णदेवराय के काल में विजय नगर स्वर्ण नगरी बन गयी थी। कृष्णदेवराय के सिंहासन पर बैठने के तुरंत बाद ही बहमनी सुल्तान ने विजय नगर पर आक्रमण कर दिया लेकिन शूर वीर कृष्णदेवराय ने उन्हें युद्द में धूल चटाकर हरा दिया। इतिहास गवाह है कि सदियों से ही हिन्दु राजाओं की एक ही गलती होती थी की वे अपने शत्रुओं को क्षमादान देते थे और आगे जाकर उनकी यही क्षमा गुण उन के लिए आत्मघाती साबित होती रही है। विजय नगर के साथ भी वही हुआ।

भारत के राजाओं की ‘धर्मनिरपेक्षता’ के कारण ही बड़े बड़े साम्राज्यों का पतन हुआ है। आज भी भारत की ‘धर्मनिरपेक्षता’ की दुहाई देकर ही इस्लामी आतंकवादियों की पैरवी करके उन्हें क्षमादान देने की मांग हमारे देश में किया जाता है। श्री कृष्णदेवराय के काल में विजयनगर केवल देश में नहीं अपितु समूचे विश्व में ही अत्यंत समृद्ध साम्रज्य बनता है। विजय नगर में हीरे मोती कौड़ी के दाम बिकते थे। न चॊरी होती थी और ना लूट पाट। जब देश सुभिक्ष हो तो अपराध अपने आप कम हो जाता है। विजय नगर के अरब और पुर्तुगाल जैसे देशों से व्यापार संबंध भी थे। कृष्णा तट में अनगिनत बहुमूल्यवान हीरे मिलते थे। कुछ लोगों का मानना है की शमंतक मणि जिसे कॊहीनूर कहा जाता है वह विजय नगर साम्राज्य से ही प्राप्त हुई थी। साम्राज्य में बाज़ार लगता तो देश विदेश के पर्यटक बाज़ार देखने आते थे। यहां का बाज़ार विश्व भर में सुप्रसिद्ध था।

श्री कृष्णदेवराय के सैन्य में 35,000 घुड़सवार हुआ करते थे। सदा युद्ध सन्नद्ध उनकी सेना में 50 कप्तान और 1,50,000 सैनिक हुआ करते थे। श्री कृष्णदेवराय कुशाग्रमती और शूर वीर थे इसी कारण उनके समय में विजयनगर साम्राज्य पर मुघल आक्रमणकारी कभी जीत हासिल नहीं कर पाए। दक्षिण भारत में 200 वर्षों तक सम्राज्य का अस्तित्व रहना इस बात का साक्ष है की साम्राज्य की नींव कितनी मज़बूत रही थी। श्री कृष्णदेवराय ने संगीत और साहित्य को भी अधिक प्रॊस्ताहन दिया था। कर्नाटक संगीत के पिता महा पुरंदरदास का जन्म भी इसी साम्राज्य में हुआ था। तेनालीरामा की कथाएं तो पूरे विश्व में जन जनित है। कृष्णदेवराय स्वयं संगीत, साहित्य और कला के आराधक थे।

वास्तुकला का अद्भुत निदर्शन श्री कृष्णदेवराय के काल में बनाई गयी मंदिरों में देखने को मिलता है। अनुमान है की उस समय अत्याधुनिक यंत्रों का उपयॊग कर मंदिर और अन्य स्मारकों को बनाया जाता था। विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हंपी जो कट्टरपंथियों की बर्बरता की निशानी बनकर आज खड़ी है वह एक समय में स्वर्ण नगरी हुआ करती थी। जहां हीरे मोती सब्ज़ी से भी कम दाम में मिलता था, अनुमान लगाइए की विजयनगर कितना समृद्ध साम्राज्य हुआ करता था! श्री कृष्णदेवराय के मृत्यु के पश्चात साम्रज्य में बहमनी सुलतानों द्वारा प्रेरित अंतकलह शुरू हो चुका था। विजयनगर की ‘धर्मनिरपेक्षता’ के कारण कई सारे मुसल्मान राज्य की सेना में शामिल हुए थे। कई मुसल्मान राज्य के उंचे पद पर नियुक्त किए गये थे। राम राय की धर्मसहिश्णुता का पता इस बात से लगता है की उसने बीजापुर के आदिल शाह को गॊद लिया था और अपने सिंहासन के पास कुरान रखता था। जानकार कहते हैं की साम्राज्य के कुछ मुस्लिम बहमनी सुल्तानों के लिए जासूस का काम करने लगे थे।

इस बात का साक्ष्य तब मिलता है, जब 1565 में जब राम राय और सुल्तानों के बीच ‘तालिकॊट’ युद्द होता है। कहते हैं कि राज्य के दो मुसल्मान, बहमनी सुल्तानों के पक्ष में चले जाते हैं और राम राय युद्द हार जाता है, उसे बंदी बनाया जाता है और उसका सर काट दिया जाता है। उसका भाई तिरुमल देवराय जान बचाकर भाग जाता है। भारत के इतिहास में किसी साम्राज्य को इस तरह क्षत-विक्षत नहीं किया गया होगा जिस प्रकार विजयनगर को किया गया है। सुल्तानों ने स्वर्ण नगरी को जलाकर राख कर दिया। विजय नगर मे लूट-पाट मचाया और 5 महीनों तक व्यवस्तित रूप से सम्राज्य को बरबाद करने का काम करते रहे। साम्राज्य की राजधानी हंपी जो कभी भारत की गौवगाथा गाती थी आज ‘हाल हंपी’ यानी ‘तबाह हंपी’ कही जाती है। जिन लोगों ने विजय नगर को तबाह किया उनकी निशानी गोल गुंबज़ और चार मिनार आज भी सही सलामत खड़ा है लेकिन भारत के भव्य इतिहास को विश्व भर में फैलानेवाला विजयनगर साम्राज्य आंसू बहाते हुए खंडहर बन कर विलाप कर रहा है।

भारत के सभी मंदिर, साम्राज्य और स्मारकों से खामॊश चीख निकलती है जो हठधर्मियों की बर्बरता से त्रस्त अपनी कथा सुनाती है। लेकिन उनकी खामोश चीखें किसी के भी कानों में नहीं पड़ती। उनकी अवाज़ सुननेवाला कॊई नहीं है। उनके आंसू पॊछनेवाला कॊई नहीं है…यह ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश है यहां ‘हिन्दु हित’ के लिए आवाज़ उठाना अपराध है।

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