आध्यात्मिकसंस्कृति

धर्म के लिए अपने बच्चों का समर्पण करने वाले महान गुरु गोबिन्द सिंह के प्रकाश दिवस पर उनको शत शत नमन

 

भारत सनातन काल से ही अदम्य साहसी और शूर वीरॊं का देश रहा है।हमारे देश में सिख कॊम अपने प्राकरम के लिए जानी जाती है। आज भी सरहद पर मर मिटनेवालों में सिखों की संख्या सबसे ज्यादा है। देश और धर्म से कैसे प्यार किया जाता है कॊई सिखों से सीखें।

ऐसे ही एक है सिख कौम में महान गुरु, गुरु गोबिन्द सिंह जिन्हें  ज्ञान, सैन्य क्षमता और दूरदृष्टि का सम्मिश्रण माना जाता है| उनका जन्म पटना साहिब में हुआ था और वहां उनकी याद में एक खूबसूरत गुरुद्वारा भी निर्मित किया गया है| वे सिखों के 10वें  गुरु थे|उन्होंने ही साल 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी| उन्होंने ही गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का गुरु घोषित किया| गुरु गोबिंद सिंह जी का सिख समुदाय के विकास में बहुत बड़ा हाथ है| सिख समुदाय में वे आखरी सिख गुरु थे और उन्हें इसी कारण परम गुरु, गुरु ग्रन्थ साहिब के नाम से जाना जाता है।

उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है उसका निर्माण किया।सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा – कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है? उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राज़ी हो गया और गुरु गोबिंद सिंह उसे तम्बू में ले गए और कुछ देर बाद वापस लौटे एक खून लगे हुए तलवार के साथ।

गुरु ने दोबारा उस भीड़ के लोगों से वही सवाल दोबारा पुछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राज़ी हुआ और उनके साथ गया पर वे तम्बू से जब बहार निकले तो खून से सना तलवार उनके हाथ में था। उसी प्रकार पांचवा स्वयंसेवक जब उनके साथ तम्बू के भीतर गया, कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस लौटे और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया।

उसके बाद गुरु गोबिंद जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छठवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय  से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। उन्होंने क शब्द के पांच महत्व खालसा के लिए समझाया और केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा इन पांच ककारों के नाम बताये|

गुरुजी ने चमकौर में वजीर खान के साथ युद्द किया था जिसमें गुरु जी के दोनों बड़े पुत्र अजीत सिंह व जुझार सिंह अतुलनीय वीरता का प्रदर्शन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। चमकौर का युद्ध 1704 में 6 दिसम्बर को गुरु गोबिंद सिंह और वजीर खान की अगुआई में मुगलों की सेना के बीच पंजाब के चमकौर में लड़ा गया था। इस युद्ध में मुगलों की विशाल सेना के सामने मामूली सी सिख सेना थी। लेकिन सिखों ने बहुत ही वीरता से लड़ते हुए मुग़लों के छक्के छुड़ा दिए थे।।

भारी भरकम सेना के बावजूद मुगल सेनापति वजीर खान गुरु गोबिंद सिंह को पकड़ने में नाकाम रहा, लेकिन इस युद्ध में गुरु जी के दोनों पुत्रों , साहिबज़ादा अजीत सिंह(18) व साहिबज़ादा जुझार सिंह(14) ने शहीदी प्राप्त की। गुरु गोबिंद सिंह ने इस युद्ध का वर्णन ज़फ़रनामा में किया है। ज़फ़रनामा अर्थात ‘विजय पत्र’ गुरु गोबिंद सिंह द्वारा मुग़ल शासक औरंगज़ेब को लिखा गया था। ज़फ़रनामें में उन्होंने बताया है कि जब वे सरसा नदी को पार कर चमकौर पहुंचे तो किस तरह मुगलों ने उन पर हमला किया। गुरूजी के दोनों छोटे पुत्र ज़ोरावर सिंह(9) व फतेह सिंह(7) को सरहिंद के नवाब वज़ीर खान द्वारा जीवित ही दीवार में चिनवा दिया गया।

गुरूजी ने औरंगज़ेब को सम्बोधित करते हुए पत्र लिखा, ‘उसका (ईश्वर का) नाम लेकर, जिसने तुम्हें बादशाहत दी और मुझे धर्म की रक्षा की दौलत दी है, मुझे वह शक्ति दी है कि मैं धर्म की रक्षा करूं और सच्चाई का झंडा ऊंचा हो।’ गुरु गोबिंद सिंह ने इस पत्र में औरंगज़ेब को ‘धूर्त’, ‘फरेबी’ और ‘मक्कार’ बताया। साथ ही उसकी इबादत को ‘ढोंग’ कहा तथा उसे अपने पिता तथा भाइयों का हत्यारा भी बताया।

गुरु गोबिंद सिंह ने अपने स्वाभिमान तथा वीरभाव का परिचय देते हुए लिखा, मैं ऐसी आग तेरे पांव के नीचे रखूंगा कि पंजाब में उसे बुझाने तथा तुझे पीने को पानी तक नहीं मिलेगा। व् गुरु गोबिंद सिंह ने औरंगजेब को चुनौती देते हुए लिखा, ‘मैं इस युद्ध के मैदान में अकेला आऊंगा। तुम दो घुड़सवारों को अपने साथ लेकर आना।’ फिर लिखा, व्क्या हुआ (परवाह नहीं) अगर मेरे चार बच्चे (अजीत सिंह, जुझार सिंह, फतेह सिंह, जोरावर सिंह) मारे गये, पर कुंडली मारे डंसने वाला नाग अभी बाकी है।’

अपने चारों पुत्रॊं को खॊने के बाद भी वे टूटे नहीं। यह कहा जाता है कि गुरु गोबिंद सिंह नें कुल चौदह युद्ध लढाई लड़ी परन्तु कभी भी किसी पूजा के स्थल के लोगों को ना ही बंदी बनाया या क्षतिग्रस्त किया।

गुरु गोबिंद सिंह के 11 ऐसी बातों  का वर्णन किया है जिन्हें हम अपनी ज़िन्दगी में शामिल करके अपनी ज़िन्दगी बेहतर बना सकते है| धरम दी किरत करनी जिसका अर्थ है अपना जीवन ईमानदारी पूर्वक काम करते हुए चलाएं| दसवंड देना अर्थात  अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दान में दे दें|गुरुबानी कंठ करनी मतलब गुरुबानी को कंठस्थ कर लें, काम करने में दरीदार नहीं करना अर्थ काम में खूब मेहनत  करें और काम को लेकर कोताही न बरतें| धन, जवानी, तै कुल जात दा अभिमान न करना जिससे तात्पर्य है की  अपनी जवानी, जाति और कुल धर्म को लेकर घमंडी होने से बचें|

दुश्मन से नाल साम, दाम, भेद, आदि उपाय अपनाके युद्ध करना मतलब दुश्मन से भिड़ने पर पहले साम, दाम, दंड और भेद का सहारा लें, और अंत में ही आमने-सामने के युद्ध में पड़ें. किसी की  निंदा, चुगली, और किसी से इर्षा न करना मतलब किसी की चुगली-निंदा से बचें और किसी से ईर्ष्या करने के बजाय मेहनत करें|

परदेसी, लोढ़वंद, दुखी, अपंग, मानुख की यथाशक्त सेवा करनी तात्पर्य  किसी भी विदेशी नागरिक, दुखी व्यक्ति, विकलांग व जरूरतमंद शख्स की मदद जरूर करें|अपने हर वचन को निभाना मतलब  अपने सारे वादों पर खरा उतरने की कोशिश करें| शस्त्र विद्या और घोड़े की सवारी दा अभ्यास करना अर्थात  खुद को सुरक्षित रखने के लिए हथियार चलाने और घुड़सवारी जरुर सीखें| जगत-जूठ तंबाकू बिखिया का त्याग करना मतलब  किसी भी तरह के नशे और तंबाकू का सेवन न करें|यदि हम गुरूजी के इन वचनों को अपने जीवन में शामिल करें तो हमारा जीवन बहुत सुखद होजायेगा|

सवा लाख से एक लड़ाऊं,

चिड़ियन ते मैं बाज तुड़ाऊं,

तबै गुरु गोबिंद सिंह नाम कहाऊं ||

 

गुरु जी के प्रकाश पूरब पर उन्हें शत शत नमन|

 

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