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हिंदू आदर्शों के लिए अपना जीवन न्योछावर करने वाले भारत रतन मदनमोहन मालवीय के बारे में जानने लायक कुछ तथ्य:जरुर पढ़े

मदनमोहन मालवीय जैसे सम्मानित व्यक्तित्व को आज देश की जनता भूल चुकी है| आज अपने इस प्रयास से मैं उस  शख्सियत की लोगों को याद दिलाना चाहूंगी जिनका लोगों की जिन्दगी में आज वो मुकाम नही है जिसके वै हकदार है। प्रसिद्ध शिक्षाविद् और राजनेता पंडित मदन मोहन मालवीय को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार- भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया|

1861 को प्रयाग(इलाहाबाद) में आज के दिन  संस्कृत विद्वानों के परिवार में पं। बैजनाथ व मूनादेवी के यहाँ एक महामानव का जनम हुआ जो देश के लिए एक आदर्श पुरुष बनगए| पंडित मदनमोहन मालवीय या महामना मालवीय जैसे उन्हें सब प्यार से जानते थे भारत  के पहले और अन्तिम व्यक्ति थे जिन्हें महामना की सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया|  मालवीय जी बहुरंगी व्यक्तित्व वाले महान पुरुष है| मालवीय जी ने अपने जीवनकाल में जो आलोक बिखेरा, वह आज भी भारतीयों को आलोकित कर रहा है|

महामना ने इस बात को महसूस कर लिया था कि राजनीतिक आजादी तभी अर्थवान बनेगी, जब हम प्रगतिकामी और संस्कारशील नौजवानों को गढ़ने में कामयाब होंगे। इसके लिए विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालय जरूरी था, पर उस का निर्माण किया कैसे जाए| मालवीय जी एक साधारण परिवार से थे| उनके पास विश्वविद्यालय का निर्माण करने के लिए धन नही था| उस वक़्त अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी राज की शुरुआत करके हमारे पौराणिक शिक्षा को दबा दिया था| ऐसे में, विश्वविद्यालय की स्थापना कैसे होगी ये विचार उनके गले से नही उतर पा रा था।

पर जब उन्होंने ठान लिया तो इस बात को पूरा करने के लिए उन्होंने बहुत हाथ पैर मारे| उन्होंने अपनी कानूनी प्रक्रिया छोड़ दी और जनवरी 1911 में अपना मिशन शुरू किया, ये एक वाक्य ब्यान करता है की उन्होंने क्या क्या किया। हैदराबाद के निजाम बेहद कंजूस थे। वह अपने परिजनों तक को जरूरी खर्च नहीं देते थे, ऐसे में उनसे दान ले लेने की सोचना तक दुस्साहस था। दृढ़ निश्चय के धनी मालवीय जी उन तक से इतनी बड़ी धनराशि ले आए|

ऐसे ही लोगों को मनाते झुझते और सहास से आगे बड़ते हुए उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रखी। मालवीय जी ने देश-विदेश के विद्वानों को काफी मशक्कत से वहाँ पढ़ाने के लिए मनाया। मालवीय जी मानते थे कि हमें नए जमाने से तालमेल रखना है, तो अपनी नींव के मजबूत पत्थरों का भी सजदा करना होगा। उस जमाने में भी वह महिला महाविद्यालय की स्थापना करना नहीं भूले।

वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के शुरुआती नेताओं में से एक थे, एक बहुत ही सही हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी, जो हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देती थी , और संगठन में सबसे उदारवादी आवाजों में से से एक थे। उनके बहुत सारे अलग अलग नामों से नवाज़ा गया है, रबींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें “महामना”, महात्मा गांधी ने उन्हें “प्रता स्मरण्य” और “देवता पुरूष” कहा तो वहीं उन्हें ‘धर्मात्मा” , ‘कर्मयोगी’ और “गरीबों का राजकुमार” नामों से भी जाना जाता है|

उन्होंने मुंडका उपनिषद से सत्यमेव जयते शब्द को लोकप्रिय बनाया, जिसका मतलब सत्य की ही विजय होती है है। इसे भारत के राष्ट्रीय आदर्श वाक्य के रूप में अपनाया गया था।1909 (लाहौर) में 1918 (दिल्ली) में, 1930 (दिल्ली) में और 1932 में (कलकत्ता) उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में चार बार कार्य किया। वह असहयोग आंदोलन में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, और खिलाफत आंदोलन में कांग्रेस की भागीदारी के विरोध में थे। उन्होंने भारत में “खरीदें भारतीय” आंदोलन शुरू किया, और 1932 में 450 अन्य कांग्रेस स्वयंसेवकों के साथ गिरफ्तार किया गया। मलयावा ने कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस राष्ट्रवादी पार्टी बनाई और 1934 के आम चुनाव में 12 सीटों पर जीत हासिल की|

वह एक हंसमुख पत्रकार और लेखक थे, उन्होंने 1907 में एक हिंदी-भाषा की साप्ताहिक, अभ्युदय, और 1909 में एक अंग्रेजी अख़बार, द लीडर, और 1910 में मर्यादा नामक एक हिंदी मासिक पत्रिका का शुभारंभ किया। उन्होंने  हिंदुस्तान टाइम्स के बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में भी 1924 से 1946 तक कार्यकाल सम्भाला  और 1936 में उसका हिंदी संस्करण भी लॉन्च करने में मदद की।मालवीय जी जन-जागृति के लिए जरूरी शिक्षा, लैंगिक समानता, भेद-भाव रहित समाज, मीडिया और इंसाफ यानी हर क्षेत्र पर उनकी नजर और हर शेत्र में उनका योगदान था।

कई सामाजिक मुद्दों में उनकी गहरी दिलचस्पी होने के उदाहरणों देखे जा सकते है| मिंटो मेमोरियल पार्क बहुत प्रसिद्ध नहीं है, यह उनके प्रयासों का भी परिणाम था| (1910), उन्होंने एक बांध के निर्माण का विरोध किया जो हरिद्वार में गंगा नदी के ऊपर बनाया जा रहा था क्यूंकि उससे पानी का परवाह कम हो जाता इसके लिए उन्होंने सरकार को सहमत किया| 1941 में गायों की रक्षा के लिए उन्होंने गाय संरक्षण सोसाइटी को  शुरू किया|

गांधीजी उन्हें  सार्वजनिक मंचों पर अपना बड़ा भाई कहते, पर सिद्धांतों के मामले में वह गांधीजी से टकराने से नहीं चूके। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जब बापू ने छात्रों से स्कूलों के बहिष्कार की अपील की, तो मालवीय जी की असहमति जगजाहिर थी। शिक्षण संस्थानों के बहिष्कार को वह युवा पीढ़ी और देशहित के विरुद्ध मानते थे। उनका कहना था कि आजादी के बाद देश को वकीलों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और पढ़े-लिखे नौजवानों की जरूरत पडे़गी। जब बच्चे पढ़ेंगे ही नहीं, तो हमें देश चलाने के लिए काबिल लोग कैसे मिलेंगे?

महामना जानते थे कि अंबेडकर बड़ी शक्ति के तौर पर उभर रहे हैं। गांधीजी से उनका टकराव बढ़ रहा था। इसीलिए  24 सितंबर, 1932 को हुए पूना समझौते में संशोधन के लिए उन्होंने अंबेडकर को भी मनाया था। भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच समझौते पर मालवीय जी ने भी हस्ताक्षर किए थे। अगर यह समझौता नहीं हुआ होता, तो अंग्रेज दलितों की आड़ में विग्रह का एक और बीज बो गए होते। वह वाकई दूरदर्शी थे।

4 फरवरी, 1922 को हुए चौरी-चौरा कांड में 172 लोगों को फांसी की सजा हुई थी। मालवीय जी समाजसेवा और राजनीति के कारण वकालत छोड़ चुके थे, पर उन्हें लगा कि इन गरीब को अंग्रेजों का अंधा इंसाफ खा जायेगा इसलिए वै इन मजलूमों के पक्ष से  वकील  बनकर लड़े और 153 लोगों को मुक्त करा लाए। भगत सिंह की फांसी रुकवाने के लिए भी उन्होंने वायसराय से अपील की थी। अगर उनकी बात मान ली गई होती, तो शायद प्रचलित राजनीति की धारा बदल गई होती।

डॉ एस राधाकृष्णन ने कहा, “पंडित मालवीय एक कर्मयोगी है वह केवल हिंदू धर्म का प्रतिनिधि नहीं बल्कि हिंदू धर्म की आत्मा है। उन्होंने हिंदू आदर्शों के लिए अपने जीवन न्योछावर किया था| हमारे अतीत के अविनाशी खजाने को संरक्षित करते हुए, वह समय के साथ आगे बढ़ने के लिए भी उत्सुक रहते थे| काशी की पवित्रता आमतौर पर कई त्रयी में वर्णित है। इस पवित्रता में हम एक और नाम जोड़ सकते हैं पंडित मदन मोहन मालवीय जी का|

Source
Hindustan Times
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