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हैरतअंगेज खुलासा- इस तरह से अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी CIA ने ISRO को बर्बाद करने की साजिश रची

CIA को दुनिया की सबसे बड़ी व प्रभावी जासूसी एजेंसी के रूप में जाना जाता है.CIA अमेरिका में एक समांतर सरकार के रूप में स्थापित हो चुकी है और विभिन्न राष्ट्रों और उनके शासन तंत्र को नियंत्रित करने के लिए इसे विशेषाधिकार दिए गए है।CIA पर दुनिया भर के कई कट्टरपंथियों,राजनायिक हस्तियों की हत्या व अन्य प्रकार के राजनैतिक कांडो के आरोप लगे है।

जाहिर है जब ये एजेंसी पूरी दुनिया मे अपना वर्चस्व स्थापित कर चुकी है तो भारत कैसे अछूता रह जाए। भारत मे कई ऐसीे घटनायें घटी जिसमे CIA के शामिल होने पर संदेह जाहिर हुए है..विशेष रूप से CIA ने भारतीय प्रद्योगिकी और विज्ञान से सम्बंधित कार्यक्रमो में जासूसी और गहराई तक घुसपैठ कर बहुत नुकसान पहुंचाया है… हमारे कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिको को CIA ने कथित तौर पर मौत के घाट भी उतार दिया .. इन सब के पीछे सिर्फ एक कारण रहा वो भारत को शक्ति सम्पन्न बनने से रोकना था.. जिससे भारत सदा अमेरिका पर अपनी जरूरतों ( टेक्नोलॉजी और expertise) के लिए निर्भर बना रहे ।

इस लेख में आपके सामने ऐसे बहुत से तथ्य रखूँगा जिससे आपको पता लगेगा कि किस तरह से अमेरिकी एजेंसी ने एक घृणित रणनीति के तहत हमारे प्रौधोगिकी कार्यक्रम और वैज्ञानिको को नष्ट किया।

श्री नाम्बी नारायण,पूर्व वैज्ञानिक,ISRO अपनी आत्मकथा में ISRO में बिताए अपने कार्यकाल के बारे में लिखते है,विशेष रूप से जब उन्हें 1994 के जासूसी प्रकरण में गलत तरीके से फंसा दिए गया था .. 1994 में ISRO के महत्वपूर्ण दस्तावेजो व रहस्यो को बेचने के आरोप में श्री नारायण पर लगे पर 1998 में CBI कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपो से मुक्त किया.इस केस के चलते श्री नाम्बी ने अपने एक साथी वैज्ञानिक डी,सशिकुमार के साथ 50 दिन जेल में बिताए।

अपनी पुस्तक orbit of memories में उन्होंने CIA द्वारा भारतीय पुलिस और खुफिया ऑफिसर्स का इस्तेमाल कर उनके और ISRO के खिलाफ किये गए षडयंत्रो का खुलासा किया है,CIA ने भारतीय  क्रायोजेनिक राकेट इंजन प्रोग्राम के निर्माण व विकास को रोकने के लिए ये षड्यंत्र किया था,उनके अनुसार उनपे जासूसी का ये केस अमेरिकी फ्रांसीसी एजेंसियों द्वारा इस तरह से बनाया गया था की उनके ही कार्यकाल में ISRO को एक कब्रिस्तान बनाकर उसमें वैज्ञानिको को दफन कर दिया जाता …

जासूसी के इस मामले में मालदीव की एक महिला को जासूस के रूप में तैयार किया गया जिसके पास ऐसे रहस्य थे जिसका कोई पुलिस रिकॉर्ड,राजनेता,पत्रकारों की जानकारी में न हो लेकिन उनका उपयोग ज्ञात और अज्ञात रूप से CIA की साजिश के लिए इस्तेमाल हुए।

इस साल जून में पूर्व मुख्यमंत्री और सी.पी.एम. के वरिष्ठ नेता वी.एस अच्युतानंदन ने सीबी मैथ्यू की लिखित एक पुस्तक जारी की थी जो इस ISRO के इस जासूसी केस की जांच टीम के अध्यक्ष थे। नाम्बी नारायण जब इस मामले से बरी हुए तब उन्होंने सीबी से इस बारे में बात की थी।

मैथ्यू ने नारायण से कहा था कि उन्हें अनजाने में अब तक डीजीपी मधुसूदन के केस में उलझाए रखा गया था। नारायण ने षड्यंत्र के पीछे काम करने वाले सभी लोगो को उजागर करने के गहन जांच की मांग की है। नाम्बी नारायण को छोड़कर सभी अभियुक्तो को CBI ने 1998 में बरी कर दिया था… इन अभियुक्तो में बंगलोर के एक कारोबारी  एस.के शर्मा और चन्द्रशेखर भी शामिल थे,इनके अनुसार इन्हें  कथित तौर पर इस षड्यंत्र को पूरा करने के लिए किए गए व्यापारिक सौदे के विभिन्न पहलूओ को देखने का काम दिया गया..इनके साथ 2 महिलाये मरियम राशिदा और सौज़िया हसन तथा मालदीव की 2 और महिलाओं को शामिल किया जो “हनी ट्रैप” बनाती थी ।

7 सितम्बर 1998, ISRO के PSLV के सफल प्रक्षेपण के बाद भारतीय वैज्ञानिक श्री नाम्बी नारायण को इस मामले से राहत मिली,केरल हाई कोर्ट की एक बैंच ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को 3 महीने के भीतर वैज्ञानिक को 10 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा देने के निर्देश दिये। पर NHRC ने 2001 में दबाव डालने पर मुआवजा राशि देने के आदेश जारी किए.

इस मामले से आहत वैज्ञानिक श्री नारायण ने राज्य सरकार के विरुद्ध मुआवजे राशि को 1 करोड़ रुपये करने के लिए 1999 में एक और केस दायर किया.. ये मामला अभी भी तिरुवनंतपुरम की एक अदालत में लंबित है। खण्डपीठ ने NHRC के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें NHRC इन वैज्ञानिकों के खिलाफ कारवाई करने वाले पुलिस ऑफिसर्स के विरुद्ध कारवाई कराना चाहता था उसके अनुसार ये वैज्ञानिको के मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहे थे। अर्थात CIA ISRO को बर्बाद कर उसके वैज्ञानिको पर मुकदमे चलवाता तथा NHRC का प्रयोग कर स्थानीय पुलिस पर भी कारवाई करता….शाबाश क्या प्लानिंग करते है ये लोग।

इसके बाद 2006 में राज्य उच्च न्यायालय की एकल पीठ द्वारा NHRC द्वारा 2001 में दिए अन्य आदेश को भी खारिज कर दिया।

जब भारत अंतरिक्ष मे उड़ान भर रहा था और हमारी उपलब्धियों का  टीवी पर प्रसारण हो रहा था हम तिरुवनंतपुरम में अपने घर में बैठे थे और मेरा टीवी भी बंद पड़ा था। मुझे इस उपलब्धि पर गर्व..लेकिन पिछले 18 सालों से जो यंत्रणा में झेल रहा हूँ उसने मुझे तोड़कर रख दिया। न्यायालय ने हम वैज्ञानिको के पक्ष में फैसला दिया जिससे राहत मिली पर देश का वैज्ञानिक वर्ग इससे सन्तुष्ट नही है बल्कि हतोत्साहित ही हुआ है..

हम भारत की प्रगति के लिए कठोर तप करते हुए नई प्रौद्योगिकी का निर्माण करते है… लेकिन हमारा शिकार हमारे ही सिस्टम का प्रयोग करते हुए विदेशी कर जाते है.. वैज्ञानिको के लिए कोई सुरक्षा व्यवस्था नही है… बल्कि ऐसे मुकदमों से  छूटने के बाद राज्य हमे मुआवजा राशि तक नही देता है.. भारत आगे भी बढ़ना चाहता है पर अपने ही लोगो की बलि चढाकर… ये कैसा व्यवहार है.. इससे तो वैज्ञानिक हतोत्साहित हो रहे है।

 

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