आध्यात्मिकसंस्कृति

रामनाथपुरम का इतिहास

 

रामनाथपुरम (रामनाड) का समस्थान ‘सेतु नाडु’ केवल ‘सेतु’ के अस्तित्व के कारण ही, कहलाता था। इस समस्थान का राजा सेतुपति और सेतु कावलार (जलमार्ग का स्वामी) कहलाता था। ‘रामनाड’ के दक्षिण पूर्व में 6 मील दूर थिरूपुल्लानीआदिसेतु कहलाता है। रामायण के अनुसार ‘सेतु’ की रक्षा के लिये श्रीराम ने मारावर समाज के लोगों तथा यहाँ पवित्र स्नान हेतु आने वाले लोगों को नियुक्त किया।

पीढ़ियों से लोग यहाँ के राजा को सेतुपतिकहते हैं। सेतुपति वंशके एक राजा ने थिरूपुल्लानीके निकट एक नगर का निर्माण कराया। ‘सेतु’ के प्रवेश द्वार पर स्थित होने के कारण यह मुगवई कहलाया, बाद में यह रामनाथपुरम हो गया।

यह स्पष्ट है कि सेतुनाड के राजाओं का सेतु से लम्बे समय से सम्बन्ध रहा है। उनमें से आदि रघुनाथ सेतुपति, जयतुंग रघुनाथ सेतुपति, अतिवीर रघुनाथ सेतुपति, वरगुण रघुनाथ सेतुपति तथा छः अन्य का सेतुपति राजवंश के आरम्भिक राजाओं में नाम आता है।

‘रघुनाथ’ तथा ‘सेतुपति’ नाम उनके साथ, उनके श्रीराम (जो रघुनाथ भी कहलाते हैं) से सम्बन्ध तथा श्रीराम द्वारा निर्मित बंध के कारण जुड़े हैं। यह श्रीरामसेतु के अस्तित्व की स्पष्ट गवाही है तथा ‘सेतुपति’ राजवंश के समस्त राजाओं ने इस इलाके पर बड़ी भक्ति व निष्ठा से राज किया।

सनातन धर्म के ग्रंथों में अगणित वर्षों पूर्व श्रीरामसेतु का सन्दर्भ

बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर॥

बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई॥4

  • लंकाकाण्ड, श्रीरामचरितमानस

चतुर नल और नील ने सेतु बाँधा। श्री रामजी की कृपा से उनका यह (उज्ज्वल) यश सर्वत्र फैल गया। जो पत्थर आप डूबते हैं और दूसरों को डुबा देते हैं, वे ही जहाज के समान (स्वयं तैरने वाले और दूसरों को पार ले जाने वाले) हो गए॥

 

नलेन कृतः सेतुः सागरे मकर आलये ||
शुशुभे सुभगः श्रीमान् स्वाती पथ इव अम्बरे |
युद्धकाण्ड, वाल्मीकि रामायण(2.22.72)

नल के द्वारा मगरमच्छों के घर अर्थात् समुद्र पर बनाये हुए सुन्दर और सुभग सेतु ने आकाशगङ्गा के सितारों के पथ के समान शोभा पायी।

नलसेतुरिति ख्यातो योऽद्यापि प्रथितो भुवि।
रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य धार्यते गिरिसंनिभः ।।

वन पर्व, महाभारत

श्रीराम के आदेश से पर्वत जैसे ‘नल सेतुबंध’ का निर्माण किया गया था।

पुराणों में श्रीरामसेतु के संदर्भ:

 

सामुद्रं सेतुम् अगमत्महापातक नाशनम्

(दसवां स्कंदमअध्याय-79, श्लोक 15, भागवत पुराण)

अर्थात ‘तब वह (श्री बलराम) सेतुबन्ध आये जो बड़े से बड़े पाप को धो सकता है।’

            एष सेतुर्मया बद्धः समुद्रे वरुणालये
त्रिभिर्दिनैः समाप्तिं वै नीतो वानरसत्तमैः६३
– (
सृष्टि काण्डअध्याय-38, पद्मपुराण)

वानर सेना की सहायता से मेरे द्वारा यह सेतु तीन दिन के अन्दर बनाया गया।

            दृष्टमात्रेरामसेतौमुक्ति: संसारसागरात् |
हरे हरौचभक्ति: स्यात्तथापुण्यसमृद्धिता ||१८ ।।
(
सेतुखण्ड, अध्याय 1, स्कन्दपुराण)

रामसेतु के दर्शनमात्रसे संसार-सागर से मुक्ति मिल जाती है। भगवान विष्णु और शिव में भक्ति तथा पुण्य की वृद्धि होती है। इसलिए यह सेतु सबके लिए परम पूज्य है। इस प्रकार, पुराण कहते हैं कि समुद्र के मध्य में सेतु बंध श्रीराम द्वारा बनाया गया तथा इसे एक पवित्र स्थान निश्चित किया।

तमिल साहित्य में श्रीराम सेतु के सन्दर्भ

 तमिल संगम शास्त्रीय ग्रंथ अकानानुरू में सेतु का एक संदर्भ आता है जहाँ किसी ग्राम में संघर्ष के समय हुए कोलाहल तथा “महान योद्धा श्रीराम द्वारा पांड्य राज्य में समुद्र के निकट आदि सेतु के निकट सुनी गयी ध्वनि” के मध्य तुलना की गयी।

वैष्णव आचार्य पेरियावक्कन पिल्लै ने अपनी पसुराप्पदी रामायणम, कवि कुमार सामी पिल्लैने श्रीरामसेतु का वर्णन करा।

सेतुपुराणम्” जिसे ‘सेतु महातमियम’ के नाम से भी जाना जाता है, सोलहवीं शताब्दी में निराम्ब अलगिया सिंगार द्वारा लिखित संगम कालीन शास्त्रीय रचना है जिसमें 45 सरूक्क तथा 3438 पद्य हैं।रामनाथपुरम संस्थानम् के श्री पोन्नुसामी थेवर ने इस ग्रन्थ को प्रकाशित करने का बीड़ा उठाया तो तिरिसिरपुरम महाविद्वान मीनाक्षीसुन्दरम पिल्लै के शिष्य सोडषवादनम् सुब्बीराया चेट्टीयार ने सिराप्पुप्पायीरामजोड़ दिया। उसमें उन्होंने सेतु की प्रशंसा करी।

सेतु की महानता तथा इसकी पवित्रता सेतु अध्यायअध्याय में 64 पद्यों में गायी गयी है। श्रीराम के लिये सेतु निर्माण की आवश्यकता सेतु वन्द अध्यायमें बतायी गयी है। ‘सेतु माधव अध्याय’ के 151 प़द्यों में तथा ‘सेतु माघव अध्याय’ में ‘सेतु यत्थरै अध्याय’ में सेतु के बारे केवल सोचने तथा इसमें एक पवित्र डुबकी लगाने से होने वाले लाभों के बारे में बताया गया है। तमिल साहित्य में ‘ताल पुराणम’ (खण्ड-1) में भी ‘सेतुपुराणम्’ का वर्णन है।

थिरू ज्ञान सम्बन्दर कहते हैं “जो श्रीराम की पूजा करते हैं तथा उनके चरण कमलों पर समर्पण कर देते हैं, जिन्होंने (श्रीराम ने) गरजती हुई लहरों वाले समुद्र पर सेतु बनाकर, समुद्र पार करके दस सिर वाले रावण पर विजय प्राप्त की, उनकी सब चिंताएं समाप्त हो जाती हैं।”

अलग-अलग भाषाओं में, अलग-अलग समयों पर उपर्युक्त महाकाव्यों, पुराणों तथा साहित्य से ये सभी संदर्भ इस तथ्य की गवाही देते हैं कि सेतुबंध का निर्माण श्रीराम द्वारा नल को दिये गये आदेशों के अनुसार हुआ था।

ब्रिटिश गवर्नर द्वारा सेतु की प्राचीनता की समीक्षा

प्रसिद्ध स्वर्गीय श्री बी॰ सुन्दरम्, आई॰ए॰एस॰ (सेवानिवृत्त) के अनुसार सन् 1914 में मद्रास के तत्कालीन गवर्नर लार्ड पैंटलैंड ने वाइसराय लार्ड हार्डिंग को लिखा था कि “मैं आपसे गम्भीरतापूर्वक प्रार्थना करता हूँ कि आप रामेश्वरम व इसके सुंदर वातावरण का विस्तृत व गहन सर्वेक्षण हेतु भारतीय पुरातत्व विभागको निर्देश दें, विशेष रूप से ऐतिहासिक और मौलिक एडम्स ब्रिज के संदर्भ में।”

नासा वैज्ञानिकों का श्रीरामसेतु प्राकृतिक होने के विषय में सन्देह

पहले के अधिकांश तर्क परिकल्पनाओं तथा नासा की उपग्रह से ली गयी छवियों से प्राप्त आंशिक आंकड़ों पर आधारित हैं। निस्संदेह रूप से ये छवियाँ चौंकानेवाली हैं क्योंकि इनसे इस क्षेत्र की सामुद्रिक भू आकृतियों के बारे में पता चला है। लेकिन नासा के वैज्ञानिकों ने स्वयं कहा है “कक्षा से ली गयी दूर संवेदी छवियाँ द्वीपीय शृंखला की आयु या उद्भव के बारे में सीधी जानकारी उपलब्ध नहीं करा सकती हैं, तथा सुनिश्चित नहीं कर सकती हैं कि इन नमूनों की उत्पत्ति में मनुष्य सम्मिलित थे या नहीं।”

‘जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’द्वारा नासा वैज्ञानिकों के सन्देह का खण्डन

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के सेवानिवृत्त निदेशक एस॰ बद्रीनारायणन के अनुसार उनकी शोधों से ज्ञात हुआ है कि श्रीरामसेतु एक प्राकृतिक संरचना नहीं है बल्कि निर्मित मार्ग है।

डा॰ बद्रीनारायणन के निष्कर्ष भू वैज्ञानिक तथा भू भौतिकी सर्वेक्षणों तथा कड़े फील्ड वर्क पर आधारित थे। इनमें इस इलाके में बालू जमाव तथा आंतरिक उथली उत्खननभी सम्मिलित थी। अब बहुत मात्रा में भूवैज्ञानिक सूचना उपलब्ध है। 

श्रीरामसेतु की रचना का सर्वेक्षण

  • श्रीरामसेतु को भारतीय क्षेत्र से जोड़ने वाला भूभाग रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी पूर्वी किनारे से प्रारम्भ होता है। यह द्वीप अपने आप में एक लम्बा रेतीला क्षेत्र है व यहाँ चूने-रेत के पत्थर तथा प्रायः विद्रुम (मूँगा) की संरचनाएं मिलती हैं सन् 1964 में आये भयंकर तूफान से यह इलाका तहस-नहस होकर समुद्र में बह गया था। रामेश्वरम द्वीप पम्बन क्षेत्र के द्वारा मुख्य भूमि से जुड़ा हुआ है और पश्चिम में चारनोसाइट तथा ग्रेनाइट जैसे खनिज मिले हैं।
  • इस क्षेत्र के भूवैज्ञानिक तथा संरचनात्मक आयामों को सामुद्रिक रूचि की दृष्टि से समझने के लिये, एक “शोध जलयान” पर बहुत से सर्वेक्षण किये गये। इस जलयान पर पानी के नीचे सेंसर लगे थे। इन प्रयोगों में बहु किरणीय प्रतिध्वनि सर्वेक्षण समुद्र तल की जानकारी हेतु सर्वेक्षण किनारों की जानकारी के लिये ध्वनि व चुम्बकीय सर्वेक्षण सम्मिलित थे। पूरे क्षेत्र का वाइब्रो कोर लगाकर (समुद्री क्षेत्रों में नमूने लेकर सर्वेक्षण की एक विधि) नमूने लिये गये, यह सर्वेक्षण मुख्य रूप से श्रीरामसेतु की उत्तर दिशा में किये गये। इन सर्वेक्षणों के लिये सामान्यतः 4 मीटर गहरे जल की आवश्यकता थी ताकि उपकरणों को हानि न पहुँचे। बैथीमीट्रिक सर्वेक्षण (समुद्र की तली की गहराई नापने की विद्या) से इस तथ्य का पता चला कि उथले जल में सेतु की ऊपरी भाग की चौड़ायी 6से 4मीटर तक है। इस इलाके के इस भाग का इन्हीं कारणों से सर्वेक्षण नहीं किया जा सका।
  • हालांकि भू वैज्ञानिक तथा भू भौतिकी सर्वेक्षणों से यह देखा गया है कि यह सेतु एक फॉल्ट जोन है जो (जहाँ पृथ्वी की आन्तरिक गड़बड़ी के कारण प्रायः भूकम्प आने की सम्भावना होती है) बंगाल की खाड़ी की तरफ से उत्तर की ओर उदित हुआ है। यह तेज ढलान जैसी संरचना श्रीरामसेतु का सबसे उथला भाग है। यद्यपि यह अधिकतर जलमग्न है, पर छोटे-छोटे टापुओं की शृंखला समुद्रतल से ऊपर भी दृष्टि गोचर होती है। अन्तर्राष्ट्रीय जल सीमा तक इस सेतु रिज पर 10बोरहोल ड्रिल किये गये हैं। दस बोरहोल में से छः बोर होल समुद्र में थे। यह बोर लॉगिंग प्रक्रिया से साफ दिखायी पड़ता है कि इस सेतु में लगभग 5मीटर से 4मीटर तक समुद्री बालू, फिर 1.5मीटर से 2.5मीटर तक चूना रेत के शिलाखंड (बड़े पत्थर) तथा विद्रुम फिर समुद्री बालू, फिर उसके बाद लगातार सघन संरचना है।
  • यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि विद्रुम की चट्टानें स्वच्छ तथा अप्रदूषित जल में ही बन सकती हैं और समुद्री जीव होने के कारण इन्हें दृढ़ व पक्की नींव (आधार) की आवश्यकता होती है।
  • इनके नीचे ढीली समुद्री बालू स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि ये प्राकृतिक नहीं हैं और इन्हें किसी अन्य स्थान से लाया गया है। जब तक किसी ने यहाँ लाकर ढेर न लगाया हो, ये यहाँ नहीं आ सकती थी। कुछ पत्थर इतने हल्के हैं कि पानी पर तैरने लगते हैं। स्पष्ट रूप से जो भी इन्हें यहाँ लाया गया, उसने इन्हें यहाँ लाने से पहले जान लिया था कि ये हल्के और मजबूत पत्थर हैं तथा इन्हें यहाँ लाया जा सकता है। ये पत्थर बहुत भार सह सकते हैं।
  • समुद्र की उथली गहराई में 5 मीटर से 2.5 मीटर मोटी विद्रुम व चट्टानों की मोटी परत जो कि एडम्स ब्रिज के ऊपरी भाग में था, प्राचीन ‘भू-मार्ग’ प्रतीत होता है। प्राचीन विद्वत्जनों ने चट्टानों और पत्थरों की बड़ी मात्रा की आवश्यकता बचाने के लिये, रिज की परत का लाभ उठाया और उन्होंने कम घने लेकिन मजबूत चट्टानों तथा पत्थरों को आसानी से दूर से ढोकर लाने का लाभ उठाया, साथ ही ये पत्थर इतने मजबूत थे कि ऊपर से मनुष्य व समुद्र की शक्तियों का दबाव भी सहन कर सकते थे।
  • श्रीरामसेतु एक आश्चर्यजनक विभाजक है जो उत्तर में अशांत बंगाल की खाड़ी को, दक्षिण के मन्नार की खाड़ी के शांत जल से अलग करता है। इस शांत स्थिति के कारण, मन्नार की खाड़ी में विद्रुम तथा जलीय जीवों की अत्यन्त दुर्लभ प्रजातियाँ विकसित होती हैं जबकि बंगाल की खाड़ी में ये प्रजातियाँ पूर्णतः अनुपस्थित हैं। बंगाल की खाड़ी में प्रतिवर्ष भयंकर चक्रवात के कारण आने वाले अशांत ज्वार व तज्जनित तलछट, एडम्स ब्रिज के रिज के कारण रुक जाते हैं तथा इससे मन्नार की खाड़ी की संवेदनशील परिस्थिति की रक्षा होती है।
  • सेतु की सफायी तथा खोलने से रेत के तली में बैठने की पूरी सम्भावना है और अशांत लहरें शांत मन्नार की खाड़ी में प्रवेश करके विद्रुम के संवेदनशील द्वीपों को नष्ट कर देंगी। वैकल्पिक रूप से श्रीरामसेतु के स्थान पर पम्बन अथवा समीपवर्ती इलाकों की सफायी करके, इन पर पनामा नहर की तरह अन्तर्सामुद्रिक नहर के तौर पर सार्थक विचार किया जा सकता है। पाक खाड़ी की तरह तथा मन्नार की खाड़ी की ओर, ऐसी आपदाओं को रोकने के लिये ताले लगाये जा सकते हैं।
  • इस प्रमाण के आधार पर डॉ सुब्रमनियन स्वामीने संस्कृति मंत्रालय को जाँच के लिये लिखा लेकिन रहस्यमय अतार्किकता के कारण मन्त्रालय ने इस मांग पर विचार करना अस्वीकार कर दिया।
  • तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति डॉ॰ अब्दुल कलाम  द्वारा भेजे गये एक सन्दर्भ में भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान विभाग के डॉ॰ बद्रीनारायण यही विचार (और कोलकाता के दैनिक ‘दी टेलीग्राफ’ में 8 मई 2007 को प्रकाशित) व्यक्त किया।
  • भारतीय पुरातत्व विभाग के पूर्व महानिदेशक प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्तास्व॰ डॉ॰ एस॰आर॰ राव ने भी केन्द्रीय जहाजरानी मन्त्रालय को अपनी राय देने के लिये लिखा था कि श्रीरामसेतु एक निर्मित, न कि प्राकृतिक संरचना है।
  • इस प्रकार तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमन्त्री करुणानिधि और उनके संगी साथी श्रीरामसेतु का अस्तित्व न होने का सफेद झूठ बोलते रहे हैं तथा हिन्दुओं की भावनाओं का अपमान करते हुए सेतुसमुद्रम् शिपिंग चैनल प्रोजेक्ट (S.C.P.) के आर्थिक तथा पर्यावरणीय व्यवहार्यता का हल्ला मचाते रहे।वहीं डी॰एम॰के॰ की राज्य तथा यू॰पी॰ए॰ की केन्द्र सरकारें उसी समय विज्ञापन देती रहीं तथा हिन्दू तीर्थ यात्रियों तथा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये सेतु का अस्तित्व व श्रीराम की ऐतिहासिकता की पुष्टि करती रहीं।
  • केन्द्रीयअन्तरिक्ष मन्त्रालय के अन्तर्गत आने वाले राष्ट्रीय दूर संवेदी एजेंसी द्वारा प्रकाशित उपग्रह छायाचित्रों की एक पुस्तक (ISBN: 817525: 6524) में दावा किया गया है कि ‘पुरातत्वीय अध्ययन’ दर्शाते हैं कि सेतु ‘मानव निर्मित’ हो सकता है। अन्तरिक्ष मन्त्रालय द्वारा सभी सांसदों को यह पुस्तक निःशुल्क वितरित की गयी है।

कॉंग्रेस(यू॰पी॰ए॰)काश्रीरामसेतुकीओरनकारात्मकदृष्टिकोण 

  • तत्कालीन संस्कृति मंत्री सुश्री अम्बिका सोनी ने राज्य सभा में एक प्रश्न के उत्तर (14 अगस्त, 2007), में गलत बयानी की कि ‘श्रीरामसेतु के सम्बन्ध में कोई पुरातत्वीय अध्ययन नहीं किये गये हैं।’
  • पर्यावरण एवं वन मन्त्रालय ने भूतल परिवहन मन्त्रालय को अपने 8 अप्रैल 1999 के पत्र में अपना मत प्रेषित किया था कि सेतु समुद्रम शिपिंग चैनल प्रोजेक्ट को, एक पर्यावरणीय आपदा होने के कारण, त्याग देना चाहिए। यह मत वर्ष 1998 की NEERI रिपोर्ट के विश्लेषण पर आधारित थी, फिर भी मन्त्रालय ने सन् 2004 में, वर्ष 1998 के आंकड़ों पर आधारित अपने मत को पलट दिया। क्यों? इस पलटने का अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। श्रीराम के अस्तित्व को तथा रामायण के घटनाक्रम को नकारने में यू॰पी॰ए॰ इस सीमा तक चला गया था।
  • जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि मन्त्रालय ने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग के पूर्व निदेशक डॉ एस॰ बद्रीनारायण द्वारा तैयार एक रिपोर्ट भी दबा दी थी जो कि सेतु पर तथा निकटवर्ती समुद्र में वर्ष 2002 में खोज पर आधारित थी। इस रिपोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार श्रीराम सेतु कम से कम 9000 वर्ष पूर्व बनाया गया था और यह प्राकृतिक संरचना नहीं है जैसा कि तत्कालीन केन्द्र सरकार ने दावा किया था।
  • इसके उपस्थित होने के बाद भी, संस्कृति मन्त्रालय ने सर्वोच्च न्यायालय में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की राय लिये बिना, जल्दबाजी में एक शपथ-पत्र दे दिया कि “सरकार की जानकारी में श्रीरामसेतु के मानव निर्मित होने के सम्बन्ध में कोई सूचना अथवा अध्ययन नहीं है।” भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI)के पूर्व महानिदेशक एस॰आर॰ राव ने सरकार के इस दृष्टिकोण का उपहास किया था।

वर्तमान स्थिति

सौभाग्यवश, वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार भूतकाल की ऐतिहासिक त्रुटि को धीरे-धीरे सुधार रही है। केन्द्रीय जहाजरानी मन्त्री श्री नितिन गडकरी ने संसद में स्पष्ट शब्दों में घोषणा की है कि श्रीरामसेतु को कभी भी नहीं छुआ जायेगा चाहे सेतु समुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट  (SSCP) को पर्यावरण आधार पर कार्यान्वयन हेतु पारित क्यों न कर दिया जाये। संस्कृति मन्त्री श्री महेश शर्मा  ने प्रस्ताव पारित करने के लिये पग उठाये हैं कि श्रीरामसेतु राष्ट्रीय विरासत स्मारक के रूप में घोषित किया जाये और श्रीराम के अयोध्या से लंका गमन के मार्ग का पुनरुद्धारकिया जाये तथा श्रीराम, सीताजी तथा श्रीलक्ष्मण जहाँ भी ठहरे थे(नासिक तक), वहाँ संग्रहालय स्थापित किये जाएं।

23 नवम्बर 2017 को केंद्र सरकार ने निर्णय लिया कि श्रीरामसेतु की रक्षा करने के लिए सेतुसमुद्रम परियोजना आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। एक दिन पूर्व प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ केंद्रीय मंत्रियों के साथ बैठक में यह निर्णय लिया कि श्रीरामसेतु को हानि पहुचाने वाली किसी योजना को अनुमति नहीं मिलेगी।

11 दिसम्बर 2017 को ‘साइन्स चैनल’ ने श्रीरामसेतु को मानव निर्मित बताते हुए एक वीडियो जारी किया जिसमें अंग्रेज वैज्ञानिकों ने इन पत्थरों को दूर से लाने की एवं बालू पर पत्थरों के टिके होने की बात बतायी।


References:

 

 

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