संस्कृति

झाँसी रानी के जैसे ही एक रानी थी जिसने मुघल सैनिकों की नाक काट दी थी: ‘नाक काटी रानी’ कर्नावती के बारे में पढ़ा है आपने ?

भारत के इतिहास में ऐसे अनगिनत राजा और रानियां हैं जिन्होंने अपने असीम पराक्रम, धैर्य और साहस का उदाहरण देते हुए मुघल और अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिए थे। वे सारे महानायक और नायिकाएं हमारे समक्ष आए नहीं क्यॊंकि जानबूज़ कर उन्हें हमारे सामने लाया नहीं गया। यह ऐसी ही एक रानी की कथा है। यह रानी और कॊई नहीं अप्रतिम साहसी शूर वीर महा पराक्रमी भारत माँ के लाल महाराणा प्रताप की दादी थी। दादी इतनी धैर्य शाली तो सहज ही पोता भी उतना ही साहसी।

घड़वाल की रानी कर्नावती (1631-1640) ‘नाक काटी रानी’ के नाम से ही जानी जाती है। क्यॊंकि रानी ने मुघल जिहादी शाहजहान की सेना के सैनिकों के नाक को काट दिया था! मुघलों का तो खानदानी पेशा था हिन्दुओं को लूटना, मंदिरों को तोड़ना और औरतों का बलात्कार करना। शाहजहान जिसने अपनी बेटी तक को अपने काम के वासना का शिकार बनाया था घड़वाल के राज्य पर नज़र गड़ाए बैठा था।

मुघल काल में केवेल ऐसे भूभाग में स्थित राज्य ही खुद को बचा पाते थे जो चारों ओर पहाड़ियों से घिरे होते थे। ऐसे दुर्गम इलाकों में मुघलों को आक्रमण करने में बहुत कठिनाई झेलनी पड़ती थी। रानी कर्नावती घड़वाल के राजा माहिपत शाह की पत्नी थी। 1631 में माहिपत शाह की मृत्यू हो जाती है और उनके 7 साल के बेटे पृथ्विपत शाह को राजा बनाया जाता है। बेटे की आयु कम होने के कारण माँ रानी कर्नावती ही राज काज संभालती है। उसके वफादार मंत्री थे माधो सिन्घ भंडारी, रिखॊला लॊधी, बनवारीदास और दौलत बेग।

कुमाऊं का राजा बाज़ बहादुर और घड़वाल में हमेशा से ही युद्ध छिड़ा हुआ रहता था। बाज़ बहादुर  मुघलों के राज्यपाल नज़ाबत खान को आमिश देता है की अगर वह घड़वाल पर आक्रमण करता है तो उसकी तरफ़ से पूरी सहायता मुघलों को मिलेगी। नज़ाबत खान अपने आका शाहजहान को घड़वाल पर आक्रमण के लिए मनाता है और 30000 सैनिकों के साथ घड़वाल पर आक्रमण करने के लिए निकल पडता है। रानी को युद्ध का सामाचार मिल जाता है। वह अगर चाहती तो युद्ध विराम की संधी कर सकती थी।

लेकिन रानी ने मुघलों से संधी नहीं अपितु युद्द का अह्वान किया। मुघलों की सेना घड़वाल पर आक्रमण करती है। घड़वाल चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ राज्य था। मुघलों को इस दुर्गम रास्ते के बारे में पता नहीं था। रानी ने बड़ी चतुराई से दुर्ग में आने वाले रास्ते में दीवार खड़े किए और बड़े बड़े पेड़  गिराए। रास्ते में मिली  इन कठिनाइयों के कारण सैनिक थक गये थे। थके हारे मुघल सैनिक जैसे दुर्ग के अंदर आए रानी ने बाहर जाने वाले मार्ग को बंद करवादिया। रानी के इस अप्रत्याशित रणनिति  से मुघल सैनिक हक्के बक्के रह गये। वे ना आगे जा सकते थे ना ही वे पीछे लौट सकते थे। रानी कि चतुराई के वजह से वे बीच में ही कैद हो गये थे।

स्वंय को मौत के मुँहु मे देख कर मुघल सैनिक घबराए और उनके सेनाधिपति ने रानी को संधी के बातचीत के लिए संदेश भिजवाया। तो आगे से रानी ने शर्त रखा की अगर मुघल अपने जान की सलामती चाहते हैं तो वे अपने शस्त्र को नीचे डाले और  हार स्वीकारते हुए अपने नाक काट डाले! मुघलों के पास अपनी जान बचा ने के लिए और कॊई विकल्प नहीं था। उन्होंने अपने सारे श्स्त्र जहाँ खड़े थे वहीं त्याग दिया और एक-एक कर के अपने नाक काट दिए। कुछ इतिहासकारों का मानना है की रानी की सेना ने मुघलॊं की नाक काटी थी और अपनी नाक कटवाकर मुघल सैनिक जान बचाकर वहां से भागे थे। इस घटना के बाद शाहजहान इतना शर्मिंदा हुआ था की उसने फिर कभी घड़वाल पर आक्रमण करने का नही सॊचा।

इस युद्ध के बाद शाहजहान ने यह फ़रमान भी दिया की उस राजा( कर्नावती) को ‘नाक्टीरानी’ बुलाया जाए। जिसका अर्थ है ‘नाक काटी रानी’ जो आज तक इसी नाम से वहाँ प्रचलित है। कहते हैं की मुघल सेना का सेनाधिपती अपने अपमान को बर्दाश नहीं करपाया और उसने आत्महत्या कर ली । इतिहास के पन्नों को अगर पलटे तो ऐसी कई महा नायिका और महा नायक होगें जिनके बारे में हमें बताया  नहीं गया। इतिहास के पन्नों पर जमीं धूल को हटाएंगे तो सारे धुँधले तस्वीर स्पष्ठ नज़र आएंगे।

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