आध्यात्मिकसंस्कृति

कैसे महाकाल काल भैरव, माँ दुर्गा, प्रभु श्री राम और भगवान कृष्ण की भूमी अहिंसा की पुजारी बनगई?

गीता का सार 'धर्म की रक्षा करना भी धर्म' है, फिर हमने धर्म की रक्षा करना क्यों छोड़ दिया?

हमारे वेद- उपनिषद-रामायण और महाभारत ही हमारी धरॊहर है, भारत की पहचान है। आर्यावर्त के सभी शास्त्र हमे यही सिखाते है की धर्म की रक्षा करना भी धर्म है और धर्म रक्षा हेतु शस्त्र उठाना कॊई अपराध नहीं। धर्म की परिभाषा का अद्भुत व्याख्यान भगवान श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में दिया था। उन्होंने कहा था की साधु जनों की रक्षा करने और दुष्कर्म करनेवालॊं का संहार करने हेतु मैं बार-बार जन्म लूँगा। जब जब धर्म पर विपदा आएगा तब तब मैं लौट कर आऊँगा।

कुरुक्षेत्र रण भूमी में जब अर्जुन किंकर्तव्यमूढ़ हॊकर शस्त्र त्याग देता है तो कृष्ण ने कहा था की अपने कर्तव्य का पलान करो और धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाओ। अधर्मी तुम्हारा अपना भाई, गुरू, पिता, सगा संबंधी ही क्यों ना हो उसका विनाश करो। केवल कृष्ण ही नहीं सौम्य रूप के राम ने भी धर्म की रक्षा हेतु शस्त्र उठाए थे। अगर वे भी अहिंसा परमो धर्मः कह कर बैठ जाते तो रावण जैसे राक्षस का संहार नहीं होता। राम और कृष्ण के जन्म का मूल उद्देश ही था असुरों का संहार तथा ब्रह्मांड को धर्म और अधर्म के बीच का अंतर समझाना।

भगवान विष्णु ने समय समय पर पृथ्वी पर अवतार लिया और पापियों का संहार किया। हमारे पुराण हमे कहते है की देश और धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना हमारा कर्तव्य है। इस देश में महाकाल-काल भैरव की पूजा होती है, इस देश में माँ दुर्गा और काली की पूजा होती है। वे मृत्यू स्वरूपी रण भयंकर अवतार में पृथ्वी पर अवतरित हुए किस लिए? निसंदेह अहिंसा का जाप करने तो नहीं आए होंगे। उनके जन्म का लक्ष ही था असुरों का संहार और धर्म की स्थापना। भरत खंड आर्यावर्त का प्रत्येक राजा अपने मातृ भूमी और धर्म रक्षा हेतु शेरों की भाँति लड़ा है। श्त्रुओं के हृदय को चीर कर उसका संहार किया है।

अगर सही अर्थ से देखा जाए तो इस देश के द्वज में कृष्ण का सुदर्शन चक्र, राम का धनुष या फिर महाकाल का त्रिशूल हॊना चाहिए था। क्यॊं की विश्व में भारत की पहचान रामायण महाभारत, वेद और उपनिषद के वजह से हॊती है। आश्चर्य है की सनातन काल से ही शेरों की हिम्मत और साहस रखने वाला भारत 70 साल पहले अहिंसा का प्रतिपादक बनजाता है। काल भैरव, महा विष्णु, श्री राम,भगवान कृष्ण, माँ दुर्गा, माँ काली के आदर्श मात्र कपॊल कल्पित झूठी कहानी बनकर रह जाती है। विश्व को भारत की देन भगवद्गीता को पाठशाला के किताबों में पढ़ाया जाना चाहिए था लेकिन गीता को न्यायालय में केवल सच और झूठ की पहचान करने हेतु उपयॊग किया गया और पाठशाला के किताब में जिहादियों का गुण गान किया गया।

देश में स्वतंत्रता की चिंगारी क्रांतिकारियों ने लगायी थी। स्वराज हमारा जन्म सिद्द अधिकार है, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूँगा, इन्कलाब जिंदाबाद, वंदे मातरम जैसे ललकारों ने करोड़ों  लोगों को वीरावेश से लड़ने के लिए प्रेरित किया। लेकिन देश को यह बताया गया की अहिंसा से आज़ादी आई! उन क्रांतिकारियों का नाम इतिहास के पन्नों से हटा दिया गया। पूरे देश को भ्रमित किया गया की भारत अहिंसा का पुजारी है और भारत को बुद्द और अशॊक के अहिंसा के मार्ग में चलना हॊगा। क्या भारत की पहचान मात्र बुद्द और अशॊक से ही हॊती है? जब हम पीछे मुड़ के देखते हैं, तब हमे क्या सिर्फ़ यही लोग दिखाई देते है जो विश्व में भारत की पहचान बन सकते है?

हिंन्दु का अर्थ है अहिंसा न करनेवाला। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है की हिन्दु अपने या किसी दूसरे पर होते हुए अन्याय को चुप चाप सहते रहेगा। सनातन धर्म कहता है की धर्मॊ रक्षति रक्षितः। जो धर्म की रक्षा करेगा, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करेगा। सदैव धर्म की रक्षा करने के कारण युधिष्ठिर को धर्मराज कहा गया और उसे स्वर्ग में जगह पाने का अवसर मिला। भगवान यम किसी भी प्राणी में भेद नहीं करते इसीलिए उन्हे यमधर्मराज कहा जाता है।

माता- पिता-गुरू का आदर, महिला का सम्मान, शराणागतों की रक्षा, सदैव कार्य तत्परता, पूरे विश्व को अपना कुटुंब मानना, अन्याय के विरुद्ध लड़ना यह तो सनातन धर्म की नींव है। जब अपने पर विपदा आती है तो साधू से साधू प्राणी भी खूँखार होता है, अपनी रक्षा हेतु शत्रू से लड़ता है। हम तो फिर भी मनुष्य है तो फिर हम अन्याय को चुप चाप सहें यह कैसा न्याय है? वीर रस ही प्रधान हमारी रामायण और महाभारत की छवि को विक्षत कर राम और कृष्ण का अपमान क्यों किया गया है? भारत की मात्र भाषा संस्कृत का गला घॊट कर उर्दू को हम पर क्यॊं थॊपा गया है? वेद-उपनिषदों को क्यॊं जलाया गया है? शौर्य और साहस के लिए प्रसिद्द भारत को अहिंसा का पाठ पढ़ाकर क्यों हमें डरपॊक और कायर बनाया गया? आखिर क्यों…..और कब तक…?

 

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