अभिमतसंस्कृति

अरब आतताइयों द्वारा बनाया और अंग्रेजों द्वारा परिष्कृत किया एक ऐसा षड्यंत्र जो हिन्दुओं को एकजुट नही होने देरा?

 

यह पोस्ट केवल एक सामाजिक या राजनैतिक पोस्ट नहीं है , ये ध्वनि है उस युद्ध शंख की जिसे मैं आज बजाने जा रहा हूँ ।
ये पोस्ट लम्बा है, काफी लंबा – अगर आपको अपने बच्चों के और अपने भविष्य से अधिक आवश्यक कोई कार्य है तो कृपया न पढ़ें ।

प्रश्न – हम बहुत बार देखते हैं सोशल मीडिया पर कि – ‘हिंदुओं में एकता नहीं हैं , हिन्दू ही गद्दार हैं वगैरह वगैरह ‘ , तो – क्या कारण है कि हिन्दू एकजुट नहीं दिखाई पड़ते हैं ?

उत्तर –

– नहीं ! जातिवाद वह वजह नहीं है ।

– नहीं ! वह कारण कोई तथाकथित दलित और तथाकथित सवर्ण का भेद भी नहीं है ।

– नहीं !! वह कारण उत्तर भारतीय भाषा समूह का और दक्षिण भारतीय भाषा समूह का भेद भी नहीं है (विश्वास मानें , मेरे उत्तर भारतीयों से अधिक दक्षिण भारतीय धार्मिक मित्र हैं और मुझे ज़रा सी भी तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, उड़िया आदि भाषाएं नहीं आतीं ) ।

ज़रा सा विचार करें – जातिवाद इत्यादि सिर्फ 25 सालों में जड़ से समाप्त हो सकता है यदि ठीक ठाक कानून बना दिये जायें ; भाषायी भेद तो केवल 15 सालों में समाप्त हो सकता है यदि केवल सारे सरकारी स्कूलों में कोई सी एक भाषा अनिवार्य कर दी जाए !

मैं आज आपको बताता हूँ कि सनातन परंपरा (hinduism) को जो तोड़ रहा है वह एक बहुत ही सोचा समझा और ऊंचे दर्जे का षड्यंत्र है ।
एक ऐसा षड्यंत्र जो अरब आतताइयों ने बनाया और अंग्रेजों ने परिष्कृत किया ।

इस षड्यंत्र का नाम है ‘INDIA’ .

अरब आतताइयों व मुग़लों के आने से पहले ‘INDIA’ जैसा कुछ भी नहीं था – था तो बस आर्यावर्त !

इस आर्यावर्त में – वर्तमान India , पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान , ईरान (जी हां , ईरान का वास्तविक नाम आर्यानाम है ) , इराक़ (जिसे सुमेरिया कहा जाता था ) , भूटान , नेपाल , तिब्बत , इंडोनेशिया , जावा, सुमात्रा(सु – शुद्ध , मात्रा – फैलाव ) , बाली , मलेशिया , कम्बोडिया, श्री लंका , बांग्लादेश, म्यांमार (बर्मा – ब्रह्मदेश) और यहां तक कि कज़ाकिस्तान तक शामिल था (कज़ाकिस्तान का मूल नाम है – शाकिस्तान ) ।

इन सभी जगहों के शासक अलग अलग थे और थोड़ी बहुत राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था भी समय और परिस्थिति के अनुकूल ढली हुई थी किन्तु सभी के सभी क्षेत्रों में एक मूलभूत सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था थी जिसे आर्य संस्कृति कहते हैं ।

इस आर्य संस्कृति के कुछ मुख्य बिंदु होते थे जिनका सभी क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से पालन किया जाता था

1. ब्राह्मण (कर्मणा व जन्मना ) – [वैज्ञानिक, शिक्षक ,आचार्य ] ये धार्मिक हेड व पॉलिसी बनाने वाले होते थे – जैसे प्रधानमंत्री , राज पुरोहित , अन्य मंत्री ।

2. क्षत्रिय (जन्मना व कर्मणा) – [योद्धा, सैनिक इत्यादि ] ये राजनैतिक व सामरिक हेड हुआ करते थे ।

3. वैश्य (जन्मना व कर्मणा) – [ व्यापारी , उद्योगपति , उद्यमी इत्यादि ] ये वित्तीय हेड हुआ करते थे ।

4. शूद्र ( कर्मणा) – [लेखाधिकारी , वास्तुकार , अभियंता , विद्यार्थी, चित्रकार आदि ] ये समाज का सबसे बड़ा हिस्सा हुआ करते थे व इन्ही को दिशा देने के लिए ये महाव्यवस्था खड़ी की गई थी ।

पूरे आर्यावर्त में ब्रह्मा/ विष्णु /महेश या तीनो की ही पूजा की जाती थी ।

आर्य का मतलब है – आर्ष विद्याओं का सामाजिक व्यक्तिकरण [ आर्ष का अर्थ है – ‘ अपौरुषेय ज्ञान ‘ , तो जो ऋषि हैं वे वास्तव में आर्षी /अर्षी हैं , महर्षी = मह – आर्षी , ब्रह्मऋषी = ब्रह्म – आर्षी ,
कृपया संस्कृत निरुक्त को एक बार चेक कर लें
(जी हां , मैंने अभी अभी आर्यों की एक परिभाषा दी है – #Deal_with_it )

चलिये इतिहास बहुत हो गया , मुद्दे की बात पर आते हैं -:

ज़रा विचार करें , आर्यों के पास (सनातन संस्कृति के पास) इतना अधिक साम्राज्य क्यों और कैसे था ?

सनातन संस्कृति वाले हमारे पूर्वज आर्यों के पास इतना विशाल साम्राज्य इसलिए था क्योंकि वे भौतिकवादी और आध्यात्मवादी दोनों थे ।
जी हां , आपने सही पढ़ा – भौतिकवादी और आध्यात्मवादी ।

लेकिन आप कहेंगे कि सनातन व्यवस्था तो इतनी महान है कि वह भौतिक भोग विलास से बहुत ऊंची है और उसका सांसारिक सुखों से कोई लेना देना नहीं है ।

चलिये, मैं आपको बताता हूँ कि ये सब सिर्फ कोरी झूठी बकवास है !!

ऐसी बातें कि – ” सनातन संस्कृति भौतिक सुखों और आनंदों के विरुध्द है ” , ये बातें जानबूझ कर एक बहुत बड़े व लम्बे षड्यंत्र के तहत आपको समझाई जा रही हैं !

ये एक ऐसा षड्यंत्र है जो किसी भी तरह धार्मिक सनातन संस्कृति को खत्म करना चाहता है और खत्म करना चाहता है मुक्त विचार को , आत्मिक ज्ञान को , मुक्त सामाजिक व्यवहार को ।

तनिक सोचिए , मनुष्य केवल एक परिष्कृत पशु ही तो है न ?
और पशु की मुख्य प्रेरणा क्या होती है ?

भोजन , सेक्स और क्षेत्र !

मनुष्य जैसे परिष्कृत पशुओं में भोजन का अर्थ थोड़ा और विस्तृत हो गया है = वैभव ।
सेक्स = स्त्रियाँ
क्षेत्र = वह क्षेत्र जिस से वह कर (Tax) वसूल सके ।

मनुष्य मस्तिष्क में अधिकाधिक वैभव, स्त्रियां व अधिकाधिक क्षेत्र पर आधिपत्य करने की भावना तो स्वाभाविक ही है !! (जी हाँ , इसी वजह से आपको 2 BHK के अपार्टमेंट से अधिक एक पेंटहाउस अच्छा लगता है )

अब थोड़ा और विचार करें – क्या होगा कि कोई बार बार , बचपन से ही आपको ये समझता रहे के ” पैसा तो हाथ का मैल है , सबसे बड़ी तपस्या तो त्याग है – सब कुछ त्याग दो , साथ क्या लेकर आये थे , साथ क्या लेकर जाओगे , अमीर आदमी को भगवान कभी प्रेम नहीं करते , लक्ष्मी नारायण वास्तव में दरिद्रनारायण हैं , इत्यादि इत्यादि ”

क्या होगा अगर आपको बचपन से उपरोक्त अधूरी व अधकचरी बातें सिखाई जाएं ?

यदि ये बातें आपको सिखाई जाएं (और सिखाई गयीं हैं , हैं न ? ) तो आपका व्यक्तित्व एक टूटा, hypocrite व बिखरा हुआ व्यक्तित्व हो जाएगा – क्योंकि आपका सहज मनुष्य स्वभाव तो आपको प्रेरित करेगा अधिकाधिक वैभव, अधिकाधिक स्त्रियों , अधिकाधिक क्षेत्र पर आधिपत्य के लिए , किन्तु आपको जबरदस्ती जानबूझकर सिखलाई हुई बातें आपको एक तरह की आत्मग्लानि से भर देंगी और आप एक अधूरे कन्फ्यूज्ड व्यक्ति की तरह से अपना जीवन व्यतीत कर देंगे – न भगवान की ही प्राप्ति हुई और न ही भौतिक सुखों का ही खुल कर आनंद ले पाए ।
यही सिखलाई गयी बातें उस महषड्यंत्र का हिस्सा हैं – दुरात्मा गाँठि , विनोबा , पेरियार इत्यादि द्वारा सिखलाई गयी बातें एक सोच समझा षड्यंत्र हैं – हिंदुओं को नपुंसक बनाने का।

कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अधिक पढ़े लिखे हैं या नहीं , अमीर हैं या नहीं – सभी मनुष्यों में एक चीज़ समान है और वह है ये सहज स्वाभाव (instinct) – यह सहज स्वाभाव ही मनुष्यों को प्रेरित करता है अधिकाधिक वैभव, स्त्रियां व क्षेत्र पर अधिकार करने के लिये । ये सहज स्वाभाव पूर्णतः प्राकृतिक है ….और यही सहज स्वाभाव ही मनुष्य को अपनी संस्कृति से , धर्म से व राज्य से जोड़ता है ।

और फिर सोचिए कि क्या होगा जब बहुत सारे (100 करोड़ हिन्दू) ये मानने लगे जाएं के ये प्राकृतिक सहज स्वाभाव (instinct) ही गलत है ?
क्या वे कभी भी प्राकृतिक रूप से एक हो पाएंगे ? जब वे अपने ही प्राकृतिक सहज स्वाभाव को ही गलत समझ कर दबा रहे हों ।

– क्या वे कभी भी अधिक क्षेत्र पर आधिपत्य जमाने के लिए लड़ने की सोचेंगे ? क्या कभी भी वे अपने लोगों के लिए अधिकाधिक संसाधन जुटाने के लिए एक हो सकेंगे ?

– क्या कभी भी उनमें एक प्राकृतिक भाईचारे की भावना उत्पन्न हो पाएगी ? क्या कभी भी वे सामूहिक प्रयास द्वारा अर्जित संसाधनों को अपने भाइयों के बीच बांटने की सोचेंगे ??

-क्या वे कभी भी खुद को एक राष्ट्र के रूप में देख पाएंगे ?

जब से अरबी इत्यादि आतताई भारत आये , उन्होंने हमारी तकनीकें चुराईं और हमारी खोजें चुराईं – चाहें गणित हो या वैज्ञानिक तकनीक (जैसे – हमारा घट यंत्र को चुरा कर उन्होंने घड़ी बना दिया )

उन्होंने हमारी हज़ारों सालों की तपस्या से प्राप्त तकनीक व विरासत चुराईं और सारे सुबूत मिटाने की कोशिश की – इसीलिए नालन्दा , तक्षशिला इत्यादि विश्विद्यालय जलाए गए , लाखों पुस्तकें जलाई गयीं , आचार्यों , वैज्ञानिकों को कत्ल किया गया – सिर्फ इसी षड्यंत्र के तहत के किसी भी तरह हमारी आने वाली पीढ़ियों को ये समझाकर बरगलाया जा सके के उनके पूर्वज जंगली थे !!!
(खुद सोचिए , कोई भी अच्छा आदमी किसी विद्यालय को क्यों जलाएगा – यदि वह मानवता का भला चाहता हो तो )

तो वह षड्यंत्र जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूँ वह षड्यंत्र हिंदुओं को गुमराह करने के लिए है –
और मसले (जैसे जात पात,वर्ण समुदाय , क्षेत्र , पंथ) केवल हिंदुओं की आंखों में धूल झोंकने के लिए ही हैं ।
असली षड्यंत्र कुछ और है …. और यह षड्यंत्र है धीरे धीरे हिंदुओं को नपुंसक बनाने का।

इस षड्यंत्र के मुख्य बिंदु हैं -:

1. हिंदुओं के मन में धीरे धीरे ये बात भर देनी के ये संसार वास्तव में मिथ्या है -:
ये बात यदि किसी के हृदय में घर कर जाती है तो वह न क्षेत्र के लिए लड़ेगा , न स्त्रियों के लिए और न ही वैभव के लिए ।

2. हिंदुओं के मन में ये बात भर देना के वे sub consciously ये मानने लगें के गरीबी में कोई दैवीय शक्ति है और जो गरीब है उस से भगवान अधिक प्रेम करते हैं ।
इस से ये होगा कि हिन्दू गरीबी से लड़ने का प्रयास पूरी ताकत से नहीं करेगा और न ही वैभव से उपजने वाले पराक्रम को प्राप्त कर के लड़ पायेगा ।

आम हिंदुओं के मन में ये बात ज़बरदस्ती भर दी गयी है कि व्यापारी , उद्योगपति आदि धूर्त होते हैं और व्यापार ,उद्योग आदि बुरे हैं – ताकि हिन्दू नवयुवक नए उद्योग धंदे शुरू ही न करें और वैभव पर इन विधर्मियों , अधर्मियों का कब्ज़ा हो जाये ….. हिंदुओं को सिखाया जाता है कि व्यापार करने से अधिक बेहतर है कि टीचर बनो, वकील बनो , डॉक्टर बनो , इंजीनियर बनो …किन्तु व्यापार मत करो । (मुझे आज तक समझ नहीं आया कि ‘द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास’ में इतना ग्रेट क्या है ? )

3. हिंदुओं को जबरदस्ती समझाना के ये देवता, भगवान इत्यादि कोई दूसरी ही तरह के जीव होते हैं और तुम न देवता बन सकते हो और न ही भगवान ….
ये बात इतनी बुरी तरह से घुसा दी गयी है आम हिन्दू जनों के मन में के अब वो विश्वास ही नहीं कर पाते कि वास्तव में कोई भगवान बन सकता है !!

मैं बताता हूँ विष्णु पुराण को उद्धृत करके के भगवान किसे कहते हैं –

” उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् |
वेत्तिं विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ||”

अर्थ – वह जो संसार का उद्गम और अंत जानता है , वह जो जीवों के जन्म और मृत्यु के रहस्य को समझता है , वह जो ज्ञान और अज्ञान को जानता है , वह भगवान है ।

अरे भाई, योग का तो लक्ष्य ही है भगवान बन जाना !!

4. हिंदुओं को जबरदस्ती ये मनवाया जा रहा है कि वे एक ही स्त्री से विवाह कर सकते हैं ।
इससे होता ये है कि हिन्दू पुरुषों में जो पौरुष प्रजनन प्रतिस्पर्धिता का सहज स्वाभाव है वह मात खा जाता है ।
पुरुष प्राकृतिक रूप से ही बहुविवाही- बहुपत्नीक होते हैं ! और विश्वास मानिए यदि कोई व्यक्ति मानसिक, शारीरिक और वित्तीय रूप से स्वस्थ है तो वह कई पत्नियों के साथ बड़े आराम से रह सकता है ।
भगवान श्री कृष्ण की तीन पत्नियां थीं – रुक्मणि, सद्भामा, जामवंती ( महाभारत युध्द में शहीद हुए योद्धाओं की विधवाओं से शादी करने से पहले )
महर्षि कश्यप की कई सारी पत्नियां थीं ।

5. हिंदुओं को जबरदस्ती ये समझाया जा रहा है (पंचशील जैसे दोगले concepts के द्वारा) के धार्मिक रूप से भी अपने क्षेत्र को बढ़ाने के लिए दूसरों से युध्द करना गलत है।
इस से होता ये है कि हिन्दू पुरुषों में जो प्राकृतिक पौरुष है – क्षेत्र जीतने का , क्षेत्र रक्षण करने का , वह मार खा जाता है ।
आर्य राजा लोग अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करवाते थे जिसमें एक बेलगाम घोड़ा छोड़ दिया जाता था घूमने के लिए , और जो भी क्षेत्र वह घोड़ा पार करता था – वह क्षेत्र अश्वमेध यज्ञ करवाने वाले राजा के अंतर्गत आ जाता था।
(खुद सोचें – और कैसे आर्य राजाओं ने अपनी सीमाएं ईरान, इराक , कज़ाकिस्तान इत्यादि तक फैला ली थीं ?)

6. हिंदुओं को ये समझा समझा कर गुमराह किया जा रहा है कि सर्वस्व त्याग कर देना , शांति के लिए बलिदान हो जाना इत्यादि ही परम धर्म है –

बार बार ये आधा श्लोक प्रचारित किया जाता है कि – ‘अहिंसा परमो धर्म:’ – ‘अहिंसा परमो धर्म:’ …..जैसे मानो लड़ना व युध्द करना तो महापाप हो गया हो !!!
वास्तव में पूरा श्लोक है – ‘अहिंसा परमो धर्म: धर्म हिंसा तथीव च ‘ – जिसका अर्थ है कि – ‘अहिंसा बहुत बड़ा धर्म कार्य है किंतु धर्म के लिए हिंसा करना अहिंसा से भी बड़ा है ‘ !

और भी ऐसे बहुत सारे बिंदु हैं जो जानबूझकर हिंदुओं को बरगलाने व गुमराह करने के लिए प्रचार तंत्र के माध्यम से फैलाये जा रहे हैं (पिछले 100 वर्षों से भी अधिक समय से ) उन बिंदुओं को भी समयानुसार प्रकाशित करूँगा ।

सोचिए ज़रा – कैसे वो ज़रा सी अकल वाले दरिंदे जैसे ISIS, लश्कर ए तोइबा, अल कायदा , बोको हरम के लड़ाके एकजुट हैं जबकि वे जो कार्य कर रहे हैं वह किसी भी तरह से सही नहीं है !!

वे दरिंदे एकजुट हैं नए क्षेत्रों पर आधिपत्य करने में !
वे दरिंदे एकजुट हैं औरतों व बच्चियों का सामूहिक बलात्कार करने में !
किन्तु …
हम हिन्दू तो जैसे एकजुट हो ही नहीं पा रहे – वो भी अपनी खुद की स्त्रियों , वैभव व क्षेत्र को बचाने में !! अब आप शायद समझ गए होंगे कि क्यों हिन्दू एकजुट नहीं हो पा रहा है – क्योंकि हमें एक सोचे समझे और व्यवस्थित षड्यंत्र के तहत गुमराह किया जा रहा है !!
हमसे SYSTEMATICALLY हमारी पुरुष उचित प्रतिस्पर्धिता का प्राकृतिक सहज स्वाभाव छीना जा रहा है !!!

ये स्त्रियों, वैभव व अधिकाधिक क्षेत्र पर आधपत्य करने की प्रबल व सहज कामना ही है… सहज स्वाभाव ही है जो ISIS , Boko Haram, LeT , Al Qayeda इत्यादि के दरिंदे लड़ाकों को आपस में जोड़े रखती है ।

तनिक एक मिनट सोचिए – ऐसा क्यों है कि हिन्दू एकजुट होता दिखाई ही नहीं पड़ रहा है … वो भी तब जब हमारी ही आंखों के सामने लव जिहाद , जनसंख्या जिहाद जैसे हथकंडों के द्वारा हमारी ही स्त्रियों , हमारे ही भूमियों इत्यादि पर एक व्यवस्थित तरीक़े से अधिग्रहण किया जा रहा है !
ऐसी क्या कमी है हिंदुओं में के हम एकजुट होते दिख ही नहीं रहे ?!?!

मैं बताता हूँ –
हिंदुओं को जानबूझकर, एक महाषड्यंत्र के तहत , गुमराह किया जा रहा है और ये समझाया जा रहा है कि हिंदुत्व (सनातन आर्य संस्कृति) भौतिक सुखों – वैभव , स्त्रियों व अधिकाधिक क्षेत्र पर आधिपत्य के विरुध्द है ।

मेरा विश्वास करें , मेरा नहीं तो जीव विज्ञानियों का व मनोवैज्ञानिकों पर विश्वास करें कि यही भौतिक सुखों की लालसा व उन्हें प्राप्त करने का पुरुषोचित सहज स्वाभाव ही हमें एकजुट होकर सामूहिक उद्यम करने के लिए प्रेरित करता है ।

यही अदिकाधिक वैभव , स्त्री व क्षेत्र पर आधिपत्य करने का सहज स्वाभाव ही हमें एक प्राकृतिक भ्रातृत्व के सूत्र में पिरोता है ।
क्योंकि जब हम सामूहिक प्रयास कर रहे होते हैं तब हमें स्वयमेव पता होता है कि अपने दल के दूसरे लोगों की सहायता करने से हमारी अपनी सहायता हो रही होती है – अधिक वैभव, अधिक स्त्रियां , अधिक क्षेत्र प्राप्त करने में ।

मेरा विश्वास करें – अधर्मी विधर्मी आपको और आपके बच्चों को ये समझाने में दिन रात लगे हुए हैं कि मानो ब्राह्मण कुछ और चाहते हों , क्षत्रिय कुछ और चाहते हों , वैश्य कुछ और चाहते हों व शूद्र कुछ और चाहते हों ।

जबकि वास्तविकता ये है कि -:

ब्राह्मण नए क्षेत्र पर आधिपत्य करने की योजना व अस्त्र शस्त्र बनाते हैं ।
क्षत्रिय उस योजना पर चलके व उन अस्त्र शस्त्रों का उपयोग करके उस नए क्षेत्र पर युध्द करके आधिपत्य करते हैं और बाद में उस क्षेत्र का रक्षण करते हैं ।
वैश्य उस नए क्षेत्र की वित्तीय व्यवस्था को सुदृढ़ करते हैं व वहाँ पहले से बसे हुए लोगों के जीवन स्तर को भी बेहतर करते हैं ।
शूद्र उस नए क्षेत्र में बनी हुई नई व्यवस्था का उपभोग करते हुए एक उच्च कोटि का सामाजिक जीवन जीते हैं ।

हाँ बिल्कुल , बिल्कुल मानव जीवन के और भी उच्च लक्ष्य हैं – जैसे ईश्वर को प्राप्त करना , मोक्ष प्राप्त करना , विज्ञान को नई ऊंचाइयों तक ले जाना !
किन्तु ये सब तभी संभव है जब और जहां वैभव हो , वास्तविक शांति हो ।
तभी तो हिन्दू देवी देवता स्वर्ण में लदे हुए दिखाए जाते हैं !!!!
ईश्वर शब्द का शाब्दिक अर्थ ही है – परम ऐश्वर्यवान – परम् वैभवशाली !!

विचार करें , विश्वास करें ।।

नम: परमशिवाय


Manan Saxena

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