अभिमत

हादिया केस: एक हिंदु पिता की कम्युनिस्ट सोच, नास्तिकता और हिंदु धर्म के अपमान ने उसकी बेटी को मुसलमान बना दिया

इकिसवी सदी में एक 24 वर्षीय लड़की की क्या क्या सपने और महात्वाकांक्षाऐं हो सकती है? पढ़ाई में अव्वल आना, फिर अच्छी तनख़्वाह वाली नौकरी या अपनी पसंद का व्यापार शुरू करना, और हाँ एक सपनों का राजकुमार। इसके बाद घुमना फिरना, देश विदेश की यात्रा, ख़रीददारी, फ़िल्में देखना, वग़ैरह वग़ैरह।

लेकिन जब एक 24 साल की युवती, अपने पिता, परिवार और सारे ज़माने से अपने चुने हुऐ प्रेमी से विवाह करने के बजाय इस्लाम धर्म को अपनाने के लिये लड़ाई लड़ रही हो तो एक बहुत बड़ा प्रश्न उठता है, आख़िर क्यों? केरल के बहुचर्चित ‘लव जिहाद’ मामले की हादिया उर्फ़ अखिला के मन और आत्मा पर ऐसा क्या असर हुआ कि वो अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा हिंदू धर्म को त्याग कर इस्लाम धर्म को अपनाने में लगा रही है? एक आम लड़की की तरह अपने यौवन के खुबसूरूत दिनों को भरपूर जीने के बजाय अखिला इस्लाम धर्म अपनाने के लिये अपने ही माता पिता से क्यों लड़ रही है, अदालतों के चक्कर क्यों लगा रही है?
 
केरल के कोट्टायम जिले के निवासी, अखिला के 57 वर्षीय पिता के एम अशोकन बहूत ही खुले और उदार स्वभाव के हैं, खुद को बहुत गर्व से नास्तिक कहते है, और अखिला की माताजी एक निष्ठावान हिंदु हैं। हिंदु धर्म अपने अनुयायियों को नास्तिक होने की पूरी आज़ादी देता है। अखिला की गंगा नाम की रिश्तेदार बताती है कि अखिला की माताजी, पोनम्मा, देवी देवताओं का पुजा पाठ और हिदु रीति व विधान का निष्ठा से पालन करती है, इस बात पर अखिला के पिता अशोकन, अखिला के माता जी का मजाक ही नहीं उड़ाते थे बल्कि हमेशा उनका तिरस्कार भी करते थे। अखिला का पूरा बचपन अपने घर मे अपने पिता के द्वारा हिंदु धर्म का अपमान देखते हुऐ बीता।
 
बारहवी कक्षा की परीक्षा में अखिला फ़ेल हो गई। एक छात्र के जीवन में बारहवी कक्षा मे फ़ेल हो जाना एक बहुत बड़ा आघात होता है। हालाँकि दूसरी कोशिश मे अखिला पास हो गई। 2010 में 18 वर्षीय अखिला  का नामांकन तमिलनाडु के सेलम शहर मे स्थित शिवराज होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में बहुत प्रयासों के बाद हुआ। अखिला सेलम शहर के लिये रवाना हो गई। संयोगवश सेलम में अखिला को चार लड़कियों दिव्या, अर्चना, दिलना और जसीला अबुबेकर साथ किरायेपर रहना पड़ा। इस तरह अखिला का इस्लाम से परिचय पहली बार दिलना और जसीला से हुआ।
 
जसीला और उसकी छोटी बहन फ़सीना दिन में पाँच बार नमाज़ अदा करते थे। इस्लाम धर्म नास्तिक होने की आज़ादी नही देता है। जसीला और फसीना का अपने धर्म के प्रति निर्विरोध भक्ति भाव और समर्पण देखकर अखिला बहुत प्रभावित हुई। दुर्भाग्यवश अखिला होम्योपैथिक की अर्धवार्षिक परीक्षा मे फिर से फ़ेल हो गई। ये वो समय था जब अखिला का आत्मविश्वास धरातल को छु रहा था, तब जसीला ने अखिला को मानसिक और मनोवैज्ञानिक रुप से सांत्वना दिया, और होम्योपैथिक की पढ़ाई जारी रखने के लिये प्रोत्साहन दिया।
 
अखिला जब ज़िंदगी से पूरी तरह से हताश, निराश और अकेली हो चुकी थी तब पाँच वक़्त नमाज़ पढ़ने वाली उसकी मुस्लिम दोस्त ने उसको सहारा दिया और ज़िंदगी से लड़ने की हिम्मत दी। उसके बाद जैसे जैसे उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया वैसे वैसे उसके हृदय मे इस्लाम का जड़ भी गहरा होता गया। फिर उसने क़ुरान पढ़ना शुरू किया और क़ुरान के शब्दों को इंटरनेट पर पोस्ट करने लगी। और इस तरह इंटरनेट के माध्यम से अखिला की दोस्ती शिरीन और फजल मुस्तफ़ा नाम के दंपति से हूई जिसने यमन से इस्लाम को अध्ययन किया था। फ़ज़ल मस्जिद मे काम करता था। अखिला के हृदय और मन में इस्लाम पहले जड़ का रूप ले चुका था शिरीन और फ़ज़ल के एक एक शब्द ने इस जड़ को पेड़ का रुप दे दिया। 10 सितंबर 2015 को अखिला ने एक ऐफिडेविट बनवाया कि वो अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपना चुकी है।
 
अखिला के इस सच का ख़ुलासा उसके परिवार को तब हुआ जब उसने अपनी दादी के मृत्यु के बाद हिंदु रीति रिवाजों मे शामिल होने से साफ़ मना कर दिया। बिना डरे उसने अपने परिवार को बताया कि अब वो इस्लाम धर्म अपना चुकी है। इस्लाम धर्म का सम्मोहन उसके सिर पर इस क़दर सवार हो गया था कि वो अपने परिवार को भी इस्लाम धर्म में परिवर्तित करना चाहती थी। घर और परिवार मे आऐ इस तुफान के बाद भी अशोकन ने अखिला को होम्योपैथि की पढ़ाई जारी करने की अनुमति दे दी। लेकिन जब अखिला कॉलेज गई तो उसकी वेशभूषा एक कट्टर मुस्लिम महिला की तरह हो गई थी।
 
अशोकन भले ही नास्तिक थे लेकिन जब उन्हें हिंदु लड़कियों का धर्मांतरण कर सीरिया ले जाने के सच का एहसास हुआ तो उनके दिमाग़ मे ख़तरे की  घंटी बज गई। अपनी इकलौती बेटी को वापस पाने के लिये उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाना शुरू कर दिया। कानुनी प्रक्रिया की जद्दोजहद शुरू हो चुकी थी। इसी बीच अखिला ने सत्या शरणी से इस्लाम की पढ़ाई कर हादिया के रुप मे वापस लौटी। कहा जाता है इस्लाम धर्म मे बने रहने के लिये अखिला उर्फ़ हादिया ने शेफिन जहाँ से शादी कर ली, इस शादी को केरल हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। सोचने वाली बात ये है कि ‘शेफिन जहाँ’ अखिला उर्फ़ हादिया से निकाह करने के लिये क्यों मान गया जिसके पिता ने पहले से ही कोर्ट मे केस किया हुआ था?
 
श्रीमान के एम अशोकन, आप खुद को गर्व से नास्तिक और उदारवादी कहते है, खुद को कम्युनिस्ट बताते हैं और सी पी आई के सदस्य भी हैं। अगर आपकी बेटी ने इस्लाम धर्म को अपना लिया तो आपको समस्या क्यों हो रही है? जेहाद तो इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है। क्या आपको पता नहीं है कि पूरी दुनिया में लगभग हर शुक्रवार को “अल्लाह हो” के शंखनाद के बाद, एक मानव बम, खुद को उड़ाते हुऐ खुन की नदियाँ बहाते हुऐ जेहाद करता है? आपकी बेटी ने इस्लाम धर्म को गले लगाया है तो जेहाद करना भी उसका धर्म है। सनातन धर्म राष्ट्र और परिवार दोनों को जोड़कर रखता है।जब आपने अपने पूर्वजों का कहा नहीं माना, खुद नास्तिक बन गये तो आप अपनी बेटी से कैसे उम्मीद करते हैं कि वो आपके कही बातों को माने? घर, परिवार में धर्म और संस्कार की स्थापना सरकार का काम नही बल्कि ये ज़िम्मेदारी घर के अभिभावकों की है। आपने अपनी ज़िम्मेदारी कैसे निभाई? इस सवाल का जबाब आप खुद दे तो बेहतर होगा।

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