आध्यात्मिकराजनीति

जब नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का किया था विरोध

11 मई 1951 को राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी ने सोमनाथ मंदिर के शिवलिंग को पुनर्स्थापित करने के कार्यक्रम की अगुवाई की थी। आज करीब 66 साल से ऊपर हो गए इस बात को लेकिन जब जीर्णोद्धार होना था तब ये इतना आसान नही था, और इतिहास ने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में जवाहर लाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के बीच की तनातनी भी देखी। जवाहर लाल नेहरू इस जीर्णोद्धार के खिलाफ थे जबकि राजेन्द्र प्रसाद का साथ सरदार पटेल और उस समय के कैबिनेट मंत्री के एम मुंशी जी दे रहे थे।

बात भारत के आज़ाद होने के तुरंत बाद की है जब आज़ादी के बाद जूनागढ़ रियासत को भारत का अभिन्न अंग बना लिया गया था, तब गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने शपथ ली थी कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया जाएगा और उसकी भव्यता और गौरव को पुनर्स्थापित किया जाएगा। जब सरदार पटेल ने इस विषय पर महात्मा गांधी जी से बात की तो उन्हें जीर्णोद्धार से कोई आपत्ति नही थी लेकिन उन्होंने कहा कि मंदिर के पुनर्निर्माण में सरकारी पैसे का उपयोग ना हो और मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए खर्च जनता के सहयोग से हो, जिसे सरदार पटेल ने तुरंत मान लिया था, वो नही चाहते थे कि इस पर कोई बहस हो और इस वजह से कोई देरी हो।

सरदार पटेल की मृत्यु के बाद जवाहरलाल नेहरू सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे के एम मुंशी जी ने मंदिर के पुनर्निर्माण का जिम्मा अपने हाथ मे ले लिया। मुंशी जी ने कहा था कि मैं इस बात को लेकर बिल्कुल आश्वस्त हू की सोमनाथ मंदिर केवल एक ऐतिहासिक धरोहर ही नही है बल्कि इसका पूरे भारत के लोगो के मन मष्तिस्क और दिल मे स्थान है और इस मंदिर का जीर्णोद्धार एक राष्ट्रीय कर्तव्य है।

लेकिन जवाहरलाल नेहरू को सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण का विचार बिल्कुल भी पसंद नही आया था, और कई मौकों पर उन्होंने के एम मुंशी जी की इस मुद्दे पे आलोचना भी की थी। मुंशी जी को कैबिनेट में सोमनाथ से जुड़ा हुआ व्यक्ति बता कर इंगित किया जाता था। मंदिर के पुनर्स्थापन के कुछ हफ्ते पहले, 1951 के शुरुआती महीनों में नेहरू ने मुंशी जी को एक कैबिनेट मीटिंग खत्म होने के बाद बुलाया और कहा “मुझे आपकी सोमनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना की कोशिश बिल्कुल भी अच्छी नही लगी, आप हिंदुत्व को बढ़ावा दे रहे है।”

इस कथन से नेहरू के विचारों का पता चलता है, उन्हें हिन्दू जागृत करने के प्रयास से भय हो रहा था, और एक मंदिर की पुनर्स्थापना उन्हें हिन्दू धर्म का बढ़ावा लग रहा था, वो भी उस मंदिर के लिए जिस मंदिर को बार बार तोड़ा गया और जिस स्थान का इतिहास में बहुत ही महत्त्व है।

मुंशी जी दुखी थे, किंतु उन्होंने उस समय नेहरू की बातों का कोई जवाब नही दिया। और फिर अगले दिन उन्होंने एक पत्र लिख कर नेहरू को जवाब दिया। उन्होंने पत्र में लिखा कि “कल आपने हिंदू जागृत का उदहारण दिया था, मैं आपके विचार इस विषय पर जानता हूँ। पूर्व के मेरे विश्वास ने मुझे वर्तमान में कार्य करने की शक्ति प्रदान की है, और भविष्य की ओर देखने का साहस भी दिया है। मैं आज़ादी का मूल्य नही समझूंगा अगर मुझे भगवद गीता छोड़नी पड़े या हमारे लाखो लोगो को अपने विश्वास से हटा दिया जाए जिस विश्वास से वो मंदिर की तरफ देखते है। ये श्राइन एक बार हमारे जीवन मे स्थान बना लेगा तो भारतीयों को धर्म का शुद्ध अहसास होगा और ये लोगो की शक्तियों को और ज्यादा जागृत करेगा जिसकी हमे आज आज़ादी के बाद ज़रूरत है।

नेहरू को उनका जवाब पसंद नही आया। जब भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद को मंदिर के उदघाटन के लिए निमंत्रण आया तो नेहरू ने उन्हें एक पत्र लिखा और उसमें उन्होंने साफ साफ लिखा कि “मैं मानता हूँ कि मुझे आपका यूँ मंदिर के उदघाटन के कार्यक्रम से जुड़ने का विचार पसंद नही है, ये मात्र एक मंदिर का दर्शन नही है, बल्कि आपका इस मंदिर के एक विशिष्ट कार्यक्रम में सम्मिलित होना है जिसके दुर्भाग्य से ढेर सारे दूरगामी परिणाम होंगे।”

“ढेर सारे दूरगामी परिणाम” से मतलब नेहरू का ये था कि राजेन्द्र प्रसाद का मंदिर के उदघाटन में जाना भारत के सेक्युलर फैब्रिक के लिए एक चुनौती होगा। हालांकि डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू के सुझाव को दरकिनार कर मंदिर के कार्यक्रम में सम्मिलित होने का फैसला किया और नेहरू से कहा कि ” अगर मुझे निमंत्रण दिया जाता है तो मैं मस्ज़िद या चर्च के भी उदघाटन में जाऊंगा।”

फिर 11मई 1951 को डॉ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर के उदघाटन में एक शानदार और ओजस्वी भाषण दिया। उन्होंने कहा कि “हमारी सभ्यता और संस्कृति के भौतिक स्वरूपों को भले ही नष्ट किया गया हो लेकिन कोई भी शश्त्र, सेना या राजा हमारे लोगो के विश्वास और रीति रिवाजो के बंधन को तोड़ नही सकता। जब तक ये बंधन है भारतीय सभ्यता बची रहेगी। ये हम भारतीयों के अपनी सभ्यता के पुनर्स्थापन के लिए वैचारिक प्रयत्न है जो कि सैकड़ो सालो से हम भारतीयों के मन मष्तिस्क में फ़ली फूली है और जिसने एक बार फिर से सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की है। सोमनाथ मंदिर भारत की आर्थिक और आध्यात्मिक संपन्नता का सूचक है और जब तक भारत अपने पूर्व की संपन्नता को प्राप्त नहीं कर लेता तब तक सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का उद्देश्य पूरा नही माना जायेगा।”

इस भाषण को पूरे मीडिया ने प्रकाशित किया था। और इस प्रकार लाखो लोगो की भक्ति, सरदार पटेल के शपथ, और मुंशी जी के अथक प्रयासों से सोमनाथ मंदिर एक बार पुनः बनाया गया था और इसने भारत के घावों पर मरहम की तरह काम किया।

कई वर्षों के बाद, सोमनाथ मंदिर के घटना को संज्ञान में रखते हुए के एम मुंशी जी ने नेहरूवियन सेकुलरिज्म की जमकर आलोचना की। उन्होंने कहा “सेक्युलरिज्म के नाम पर, धर्म-विरोधी ताकतें जो कम्युनिज्म से प्रचारित और प्रसारित होती है वो बहुसंख्यक समुदाय के धार्मिक मुद्दों और आस्थाओं की आलोचना करती है। सेक्युलरिज्म के नाम पर अल्पसंख्यक लोग इन सब प्रभावों से बचे रहते है और वे अपनी ज़रूरी-गैर जरूरी सभी मांगो को पूरा करवाने में सफल होते है,चाहे उनकी मांगें कितनी भी नाज़ायज़ हो।”

मुंशी जी ने कहा ” जो भी सत्ताधारी राजनेता होते है वे सेक्युलरिज्म के नाम पर एक विचित्र दृष्टिकोण अपनाते है जिसमे वे अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक और सामाजिक मसलों और उनके मांगो को मान लेते है जबकि बहुसंख्यक समुदाय के उन्ही मुद्दों को प्रतिक्रियात्मक और साम्प्रदायिक बताते है। सेक्युलरिज्म ने सोमनाथ मंदिर मसले पे हिंदुत्व से कैसे दुराव दिखाया इसे इस मंदिर के पुनर्निर्माण में आई दिक्कतों और लोगो के नज़रिये को देख कर समझा जा सकता है। इन सभी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से बहुसंख्यक समुदाय में खिन्नता का भाव उत्पन्न होगा।”

“अगर सेक्युलरिज्म शब्द का ऐसे ही दुरुपयोग चलता रहा तो जब भी दो समुदायों के बीच कभी तनाव या झगड़े होंगे और उसके लिए बिना सोचे समझे, बिना मुद्दों के प्रयोजन को जाने बगैर अगर बहुसंख्यक समुदाय को दोषी ठहराया जाएगा, अगर हमारे धार्मिक महत्व के स्थानों बनारस, मथुरा और ऋषिकेश को औद्योगिक क्षेत्रों में बदला जाएगा तो बहुसंख्यक समुदाय की नैतिक और सांस्कृतिक सहनशक्ति खत्म हो जाएगी।”

ये साठ के दशक में कही गयी बाते आज भी प्रासंगिक है और नेहरू के कैबिनेट में रहते हुए भी इस सच्चाई को बयां करने वाली बातें शायद जनता के मध्य ज्यादा प्रचारित और प्रसारित नही की गई। आज बहुसंख्यक समुदाय वर्षो से अपनी उपेक्षा को बर्दाश्त करते करते ऊब गया है और अब उसने अपनी पीड़ा और अपनी मांगों को मुखर होकर कहना भी सीख लिया है।

गुजरात चुनाव में प्रचार अपने चरम पर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले बुधवार को मोरबी के बाद प्राची में भी रैली को संबोधित किया. रैली में मोदी बोले कि अगर सरदार पटेल ना होते तो सोमनाथ का मंदिर इतना भव्य नहीं बनता, लेकिन आज कुछ लोगों को सोमनाथ मंदिर याद आ रहा है मोदी बोले कि क्या तुम्हें इतिहास की खबर है. तुम्हारे परनाना ने जो कि देश के पहले प्रधानमंत्री थे उनकी कभी सरदार पटेल से नहीं बनी. कांग्रेस ने सरदार साहेब का नर्मदा का सपना भी पूरा नहीं होने दिया. मोदी ने कहा कि जब पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन करने आए थे तो भी नेहरू को उनकी यात्रा पर आपत्ति थी.

इतिहास का जिक्र करते हुए मोदी बोले कि मुंशी ने नेहरू को ज़बरदस्त चिट्ठी लिख फटकारा और कहा कि यदि धर्म छोड़ राजनीति करनी हो तो ऐसी नेतागीरी को वह लात मारते हैं. भव्य मंदिर बना. उद्घाटन में नेहरू ने मना कर दिया था किसी भी मंत्री को आने से. लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मंदिर के उद्घाटन में आने को तैयार हुवे. नेहरू ने उन्हें भी चिट्ठी लिख परिणाम भुगतने की धमकी दी. राजेंद्र प्रसाद जी फिर भी मंदिर आए. जिसके परिणाम स्वरूप अंत तक नेहरू जी ने राजेंद्र प्रसाद जी से विरोध रखा और मृत्यु तक में वह नही गए.

यह इतिहास सोमनाथ मंदिर के बाहर गैलरी में और रोज़ खेले जाने वाले लेज़र शो में दिखाया जाता है जो गुजरात के बच्चे बच्चे को अब पता है.

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