आध्यात्मिकसंस्कृति

क्या आपको पता है की मुसलमान असुर थे और उनके गुरू थे शुक्राचार्य?

भारत वर्ष ही सनातन धर्म की जननी है यह केवल सत्य ही नहीं वास्तव भी है। सत्य और वास्तव में अंतर होता है। सत्य को झूठ का चादर ओढ़ कर छुपाया जा सक्ता है लेकिन वास्तव को नहीं वह तो टस से मस नहीं होता। भारत के गौरवशाली इतिहास को क्षत विक्षत कर झूठ फेलाया गया है जिसे अकल के अंधे हिन्दू आँख मूँद्कर सच मानते हैं। प्रश्न करना हमारा अधिकार है और उत्तर प्राप्त करना हमारा कर्तव्य।

अब देखिये मुसलमान हो या ईसाई यह बात नहीं मानते की उनके पूर्वज सनातन हिन्दू ही थे। आज जो वे मक्का-मदीने में या वाटिकन में पूजा करते हैं वे कभी हिन्दू मंदिर हुआ करते थे। अपने धर्म को सनातन धर्म से ऊँचा जताने के कोशिश में वे सनातन धर्म का अपमान करते हैं। आपको यह सारी बातें पाठशाला में नहीं पढ़ाया जाता है। इसीलिए सत्य की खॊज करना हमारा दाईत्व है। साक्ष्य तो स्वयं आपको ही ढूँढ़ना हॊगा।

मुसलमान वास्तव में असुर थे। देव-दानवों मे हमेशा से ही युद्ध हुआ करता था। और हमेशा ही देवता जीतते थे और दानव हार जाते थे। वास्तव में असुर शैव थे यानी शिव की पूजा करनेवाले। दानवों के गुरू थे शुक्राचार्य। अपने शिष्यॊं की निरंतर हत्या देखकर शुक्राचार्य चिंतित हुए और उन्होंने शिव जी से सहायता माँगी कि वे अपने शिष्यों को बचा सके। शुक्राचार्य ने राक्षसों का वंश बचाने के लिए भगवान् शिव की आराधना की जिससे प्रसन्न होकर शिव जी ने अपना स्वरुप शिवलिंग शुक्राचार्य को प्रदान कर वैष्णवों से दूर रखने को कहा | शिव जी का स्पष्ट आदेश था कि जिस दिन कोई भी वैष्णव इस शिवलिंग पर गंगा जल चढ़ा देगा उस दिन राक्षस वंश का नाश हो जायेगा।

शिवजी के आज्ञानुसार असुर गुरू शुक्राचार्य ने शिवलिंग को भारतवर्ष तथा वैष्णवों से दूर रेगिस्तान में स्थापित किया जिसे आज अरब देश में मक्का मदीना के नाम से जाना जाता है । यहाँ तक कि “अरब” देश का नाम शुक्राचार्य के पौत्र “अर्व” के नाम पर ही पड़ा है | शुक्राचार्य, मूल रूप से “काव्य ऋषि” थे और उनके सम्मान में मक्का मदीना के शिवमंदिर को “काव्या” नाम दिया गया | कालांतर में काव्या नाम विकृत होकर ‘काबा’ बन गया जिसे मुसलमानों का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है | अरबी भाषा में ‘शुक्र’ का मतलब ‘महान’ माना जाता है और “शुक्रं” अर्थात शुक्रिया अथवा धन्यवाद शब्दों का जन्म भी गुरु शुक्राचार्य के नाम पर ही हुआ है | मुसलमानों का पवित्र ‘जुम्मा’, शुक्रवार को मानने कि वजह भी गुरु शुक्राचार्य ही हैं |

माना जाता है की मुसलमान औरतॊं की मुख ढ़कने की पद्दती शूर्पनखा से ही शुरू हुई थी। लक्ष्मण द्वारा नाक कटाए जाने के बाद शूर्पनखा शुक्रचार्य के आश्रम में ही रहा करथी थी और हमेशा अपना मुख वस्त्र से ढ़के रखती थी। रेगिस्तान में तपती धूप से अपने आप को बचाने के लिए लोगों ने सर पे कपडा पहनना शुरू किया। आगे जाकर लोगों ने टॊपी पहनना भी शुरू किया जिसे आज भी लोग अपने जीवन पद्दती में सम्मिलित किए हुए हैं। रेगिस्तान में कृषी नहीं किया जा सकता था इसलिये लोगों ने जानवरों को ही खाना शुरू करदिया जिसे वे आज कुर्बानी कहते हैं। लकडी न मिलने के कारण वे मृत व्यक्ती का दाह संस्कार सनातन आचरण अनुसार नहीं कर सके इसलिये उन्होंने शव को दफ़नाने की रिवाज़ को अपनाया। रेगिस्तान के हावागुण के अनुसार उन्होंने अपने आचार-विचार और जीवन की पद्दती को बदला जो आज इस्लाम की पद्दती बनगई है जिसे कठमुल्ले भारत में भी पालन करते हैं।

काबा के मंदिर में शिव लिंग की ही पूजा होती है यह बात अब रहस्य नहीं रहा है। रेगिस्तान के असुर मुघल बनकर भारत आये और भारत में आकर अपना दानवी रूप दिखाना शुरू कर दिया। हिन्दुओं का नरसंहार करना शुरू करदिया। ऐसे हिन्दु हत्यारे दानवों को महान बताकर हमें मूर्ख बनाया गया है। अब झूठ से पर्दा हटाने का वक्त आगया है। सारे दॊगुले हिन्दुओं तक यह बात पहुँचायिए और अपने मातृ धर्म की रक्षा कीजिए।


Shaanyora

Tags

Related Articles